ये हैं धान की फसल में लगने वाले सबसे डेंजर रोग, इनके आगे दूसरी बीमारियां बच्चा, कोई औकात नहीं
कृषि के क्षेत्र में 10 वर्षों का अनुभव रखने वाले रायबरेली के राजकीय कृषि केंद्र शिवगढ़ के प्रभारी अधिकारी कृषि शिव शंकर वर्मा (बीएससी एजी डॉ. राम मनोहर लोहिया, अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद) बताते हैं कि धान की फसल हमारे देश की खाद्यान्न जरूरतें पूरी करती है. खरीफ के सीजन में होने वाली यह फसल किसानों के लिए मुनाफे वाली खेती है लेकिन इसमें भी कई प्रकार के रोग लगने का खतरा बना रहता है.
खैरा रोग : यह रोग पौधा रोपण के 2 सप्ताह बाद पुरानी पत्तियों के आधार भाग में हल्के पीले रंग के धब्बे होना शुरू हो जाते हैं.इस रोग का प्रकोप होने पर पौधा बौना हो जाता है .
पर्ण चित्ती या भूरा धब्बा : यह रोग मुख्य रूप से पत्तियों पर्णछंद तथा दानों पर प्रभावित होता है पत्तियों पर गोल अंडाकार अतः कर छोटे भूरे धब्बे बनते हैं .और पत्तियां झुलस जाती हैं.
दाने का कंडवा/फाल्स स्मट (लाई फूटना) : यह धन की बाली पर ज्यादा प्रभावित होता है. बल्कि के दानों में कोयले जैसा काला पाउडर भरा होता है. इसकी वजह से दाने पकते तो है परंतु फट जाते हैं.
लोकल 18 से बात करते हुए प्रभारी अधिकारी कृषि शिव शंकर वर्मा बताते हैं कि खैरा रोग से बचाव के लिए खेत में 20 से 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर कि दर से रोपाई के पहले प्रयोग करें. झुलसा एवं भूरा धब्बा ,जीवाणु पत्ती झुलसा रोग से बचाव के लिए किसान बुवाई से पहले बीज का उपचार करें, जिस पौधे पर कोई लक्षण दिखाई दे उसे उखाड़ कर फेंक दें. दाने का कंडवा रोग से बचाव के लिए किसान प्रभावी पौधे को खेत से निकाल दें. शीथ झुलसा रोग से बचाव के लिए किसान रोग से संबंधित पौधे को खेत से निकाल कर बाहर कर दें और कृषि विशेषज्ञ की सलाह पर उचित कीटनाशक का प्रयोग करें.