16 फीट जटाएं, 12 साल का तप, जानें झिंगहाघाट में टाट महाराज अनोखी कहानी

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16 फीट जटाएं, 12 साल का तप, जानें झिंगहाघाट में टाट महाराज अनोखी कहानी


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बहराइच शहर में स्थित झिंगहाघाट के पुजारी ने कहा कि टाट महाराज की 16 फीट की जटाएं थी.12 साल के तप के दौरान वह टाट पहनते थे.अपनी जटाओं पर ही सोते थे.जटाओं का ही आसान बनाते थे

बहराइच: शहर में स्थित झिंगहाघाट जहां पर सरयू नदी के तट के किनारे कई समाधियां बनी हुई है,जिन समाधियों का अपना एक इतिहास है, वहीं पर स्थित समाधि टाट महाराज जी की है जहां के पुजारी बताते हैं कि टाट महाराज की 16 फीट की जटाएं थी.12 साल के तप के दौरान वह टाट पहनते थे. अपनी जटाओं पर ही सोते थे. जटाओं का ही आसान बनाते थे जाने टाट महाराज की पूरी कहानी.

टाट महाराज की जाने पूरी कहानी!
टाट महाराज जो एक वक्त में उदासीन पंचायती अखाड़े के महंत चुने गए थे. बहराइच शहर में स्थित झिंगहाघाट जो सरयू नदी के तट पर बना हुआ है. जिसके किनारे पंचमुखी हनुमान जी का भव मंदिर बना हुआ है,वहीं पर पास में टाट महाराज का आश्रम भी बना हुआ है. जहां पर एक वक्त में टाट महाराज ने सरयू नदी के तट के किनारे 12 साल का कठोर तप किया था. इस दौरान इन्होंने कोई भी वस्त्र नहीं पहने थे. सालों पहले विद्यालयों में चलने वाली टाट को ही इन्होंने 12 साल तक धारण किए रखा इसके अलावा उनकी जटाएं जो उस दौर में लगभग 16 से 17 फीट की जटाएं हुआ करती थी जिसको ही अपना आसन बनाते थे. अपने सिरयाना रख कर सोते थे.

12 साल के तप के बाद पड़ा महाकुंभ तो चुन लिए गए महंत!
टाट महाराज के शिष्य वीरभद्र दास बताते हैं कि 12 साल के बाद जब महाकुंभ पड़ा तो वहां पर अपनी तपस्या को पूरा करके टाट महाराज पहुंचे. जहां पर तुरंत उनको उदासीन अखाड़े का महान चुन लिया गया इसके बाद वह लीन हो गए.और उनकी समाधि आज भी बहराइच शहर के झिंगहाघाट स्थान पर मौजूद है जहा आप आकर आज भी यह समाधि देख सकते है.

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