अयोध्या यादव का परपोता बना इस देश का प्रधानमंत्री, आजमगढ़ के इस गांव से जड़ें, बदहाली ने पहुंचाया कहां से कहां
आजमगढ़: दौर था सन 1870 से 1945 का. इस बीच भारतीय मूल के लगभग डेढ़ लाख लोग भारत से त्रिनिदाद-टोबैगो (Trinidad and Tobago) गए थे. साउथ अमेरिका से सटे इस कैरेबियन द्वीप समूह के देश में गए हुए ज्यादातर भारतीय एवं अन्य देशों के लोग मुख्यतः मजदूरी का कार्य करते थे.
1997 में राष्ट्राध्यक्ष के रूप में भारत का दौरा
हम बात कर रहे हैं त्रिनिदाद-टोबैगो के पूर्व प्रधानमंत्री वासुदेव पांडे की, जो 1995 में उस कैरेबियन (Caribbean) देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए थे. अपने 2001 तक के कार्यकाल में उन्होंने 28 जनवरी 1997 को गणतंत्र दिवस के मौके पर पहली बार भारत का दौरा किया था, और उसी दौरान उन्होंने अपने पुरखों की धरती पर भी कदम रखा था.
लखमनपुर गांव में आज भी उनके पूर्वजों के घर में रहने वाले उनके प्रपौत्र देवनाथ यादव बताते हैं कि परदेश से पहली बार अपनी माटी पर आए वासुदेव पांडे के साथ उनकी पत्नी उमा पांडे और बेटी वात्सल्य भी थीं. अपने पूर्वजों की धरती पर उतरते ही उन्होंने गांव में रह रहे अपने पूर्वजों और गांव के लोगों का हाल जाना था.
देवनाथ यादव ने बताया कि त्रिनिदाद-टोबैगो के पूर्व प्रधानमंत्री वासुदेव पांडे के पूर्वजों का निवास स्थान आजमगढ़ के लखमनपुर गांव में है. इस संबंध में जानकारी उन्हें वहां से आए शोधकर्ता शमसुद्दीन नामक छात्रा से मिली थी, जिन्होंने आजमगढ़ आकर तत्कालीन जिलाधिकारी के सहयोग से सहायता ली थी. इसके बाद उन्हें यह जानकारी प्राप्त हुई थी. जानकारी के अनुसार 19वीं शताब्दी के शुरुआती दशक में निरहू यादव के बेटे अयोध्या यादव त्रिनिदाद-टोबैगो में गिरमिटिया मजदूर बनकर गए थे.
उन्होंने वहीं जाकर सुभन्ति देवी नामक महिला से विवाह किया था. इस दंपति की पुत्री किशुनदेवी का विवाह भारतीय मूल के सुखचंद्र पांडे से हुआ था, जिसके बाद 1933 में वासुदेव पांडे का जन्म हुआ. हालांकि, बताया गया कि त्रिनिदाड-टॉबैगो पहुंचने के बाद अयोध्या यादव को पानी पिलाने का कार्य दिया गया था, जहां उन्हें ‘पानी पांडे’ के नाम से पुकारा जाने लगा, जो बाद में उनके सरनेम के रूप में जुड़ गया.
1995 में बने देश के प्रधानमंत्री
अपनी शुरुआती पढ़ाई त्रिनिदाद-टोबैगो से पूरी करने के बाद वासुदेव पांडे ने 1951 में सीनियर कैंब्रिज उत्तीर्ण कर लंदन में नाट्यकला, कानून और अर्थशास्त्र की शिक्षा हासिल की. अपने देश लौटकर वे मजदूर आंदोलन से जुड़े और लंबे समय तक विपक्ष के नेता रहे. 1976 में पहली बार सांसद चुने गए और 1995 में त्रिनिदाद-टोबैगो के प्रधानमंत्री बने.
गांव में पहली बार बनी पक्की सड़क
जिला मुख्यालय से लगभग 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित लखमनपुर गांव उस समय पूरी तरह से बदहाली और उपेक्षा का शिकार था. देश के राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरे के नाते, जहां एक पक्की सड़क तक नहीं थी, वहां तीन-तीन हेलीपैड बनाए गए. गांव में तैयारी को देखने के लिए आला अधिकारी आने लगे.
इसी दौरान गांव में पहली बार 3 किलोमीटर लंबी पक्की सड़क बनी. लेकिन, आज भी यह गांव विकास की राह देख रहा है. यादव बताते हैं कि प्रधानमंत्री वासुदेव पांडे के आगमन के दौरान गांव में बालिकाओं के लिए उनके नाम से स्कूल बनाने की घोषणा हुई थी, 10 किलोमीटर पक्की सड़क भी बननी थी, लेकिन ज्यादातर योजनाएं कागजों तक सीमित रह गईं.
15 लाख का चेक लापता
यादव का कहना है कि जब वासुदेव पांडे भारत आए थे, तो उन्होंने अपने पैतृक गांव के विकास और परिजनों की सहायता के लिए 15 लाख रुपए का चेक भी दिया था, जो आज तक लापता है. परिजनों ने कई बार जिला अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन उस चेक या पैसे का कोई पता नहीं चला. प्रधानमंत्री वासुदेव पांडे के दौरे के बाद यह गांव चर्चा का विषय बना, लेकिन महज कागजों पर ही अपनी जगह बना पाया.