स्मार्ट बोर्ड और लैपटॉप! किसी हाई-टेक स्कूल से कम नहीं है नोएडा की ये चलती-फिरती पाठशाला
नोएडा: शहर की चमक-दमक और डिजिटल इंडिया की दौड़ के बीच एक ऐसा वर्ग भी है, जो अब तक बुनियादी शिक्षा से दूर है. इन्हीं वंचित बच्चों तक पढ़ाई पहुंचाने का बीड़ा उठाया है नोएडा की एक संस्था ‘चैलेंजर्स ग्रुप’ ने. संस्था द्वारा संचालित ‘पाठशाला ऑन व्हील्स’ पहल के तहत ई-रिक्शा और बस के माध्यम से स्लम बस्तियों में जाकर बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जा रही है. खास बात यह है कि ये कक्षाएं उन जगहों पर लगती हैं जहां आसपास स्कूल नहीं हैं और बच्चे मजदूरी करने को मजबूर हैं.
खोड़ा से गौर सिटी तक डिजिटल शिक्षा की गूंज
संस्था के अध्यक्ष प्रिंस शर्मा के अनुसार, यह अभियान फिलहाल शहर के खोड़ा गांव, सादतपुर, चौड़ा गांव, सलारपुर गांव और गौर सिटी के आसपास चलाया जा रहा है. लगभग 300 से अधिक बच्चे इस पहल से लाभान्वित हो रहे हैं और उनसे किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता. बस मॉडल पूरी तरह डिजिटल क्लासरूम है, जिसमें स्मार्ट बोर्ड, लैपटॉप, पंखे, लाइट, टेबल और कुर्सियां जैसी सुविधाएं मौजूद हैं. जहां भी बस पहुंचती है, वहां करीब दो से ढाई घंटे तक बच्चों को पढ़ाया जाता है.
कंप्यूटर टूल्स और नैतिक शिक्षा का संगम
इस मोबाइल स्कूल में बच्चों को नैतिक शिक्षा के साथ-साथ डिजिटल शिक्षा भी दी जा रही है. शिक्षक बच्चों को नोटपैड, वर्डपैड, एक्सेल और पावरपॉइंट जैसे बेसिक कंप्यूटर टूल्स सिखाते हैं, ताकि वे आधुनिक दुनिया से जुड़ सकें. साथ ही हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान और सामान्य ज्ञान की पढ़ाई भी कराई जाती है. बच्चों को कॉपी, किताब, पेन-पेंसिल और ड्रेस तक निशुल्क उपलब्ध कराई जाती है, ताकि आर्थिक तंगी उनकी पढ़ाई में बाधा न बने.
9 वर्षों का संघर्ष और समर्पित टीम
इस पहल को सफल बनाने में पांच से छह शिक्षक, एक ड्राइवर और एक हेल्पर लगातार जुटे रहते हैं. संचालन टीम में रोशनी कुमारी, गीतिका, अनीता, मित्तल, मंजू और शिवानी त्रिपाठी जैसे लोग प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं. पिछले नौ वर्षों से युवाओं द्वारा बनाई गई यह संस्था ‘प्लास्टिक लाओ शिक्षा पाओ’ जैसे कई अन्य कार्यक्रम भी चला रही है. शिक्षिका रोशनी कुमारी बताती हैं कि अब यह बस पूरी तरह डिजिटल क्लास बन चुकी है, जिसमें स्मार्ट टीवी के जरिए भारतीय संस्कृति की जानकारी भी दी जाती है.
बदल रहा है बच्चों का नजरिया
पाठशाला में पढ़ने वाले बच्चों की कहानी भी प्रेरणादायक है. कई बच्चे जो कभी स्कूल नहीं गए थे, वे अब हिंदी पढ़ और लिख पा रहे हैं. काम की तलाश में आए प्रवासी परिवारों के लिए शिक्षा कभी प्राथमिकता नहीं रही थी, लेकिन अब ये बच्चे समझने लगे हैं कि पढ़ाई ही उनके भविष्य को बदल सकती है. बच्चों में पढ़ाई के प्रति बढ़ता उत्साह इस पूरी टीम के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है.