भगवान कुश की नगरी में हजारों साल पुराना शीतला माता मंदिर, जहां झुककर करने पड़ते हैं दर्शन
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सुल्तानपुर में स्थित प्राचीन शीतला माता मंदिर को भगवान श्रीराम के पुत्र कुश की कुलदेवी का धाम माना जाता है. त्रेतायुग से जुड़ी मान्यताओं वाला यह मंदिर आज भी अपनी अनोखी गुफानुमा संरचना, जमीन में दबे हिस्से और प्राकृतिक वातावरण के कारण श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों के बीच खास पहचान रखता है.
सुल्तानपुर. जिसे कभी भगवान कुश की नगरी कहा जाता था, ऐसा माना जाता है कि इस शहर को भगवान कुश ने बसाया था. यह ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी सुल्तानपुर को कुसावती कुशीनगर या फिर कुछ भवनपुर कहा जाता था. ऐसे में भगवान उसके किले के पूरब दिशा में एक शीतला माता का मंदिर है. जिसे भगवान कुश की कुलदेवी के रूप में माना जाता है. यह मंदिर आज भले ही अपनी प्रसिद्धि को आगे नहीं बढ़ा सका, लेकिन इस मंदिर का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है. जो त्रेता युग से जुड़ा हुआ है.
एक हिस्सा जमीन में दबा
वहीं अगर इस मंदिर के आकार के बारे में बात की जाए तो इसका एक ढांचा किसी प्राकृतिक प्रसादी में नीचे दास गया है. इसका दूसरा ताल जमीन के ऊपर है हालांकि इसमें भी मां शीतला के दर्शन करने के लिए लोगों को अपना सर झुका कर बैठ कर जाना पड़ता है. मंदिर में अंदर जाने के लिए काफी सकरी जगह है. लगभग 10 फीट आपको मंदिर के अंदर झुक कर जाना होगा जो गुफा के आकार की है. मंदिर के पुजारी वीरेंद्र कुमार तिवारी ने बताया कि कुछ साल पहले एक बार गोमती नदी में बाढ़ आई और बाढ़ का मलवा इतना ज्यादा इकट्ठा हो गया कि इसका एक तल इस बलुई मिट्टी में दब गया. जिसकी वजह से यह मंदिर और भी महत्वपूर्ण हो गया.
मंदिर का है यह इतिहास
धार्मिक स्थलों के इतिहास के बारे में जानकारी रखने वाले अमरेंद्र नाथ द्विवेदी ने लोकल 18 से बताया कि सुल्तानपुर शहर के ठीक बगल एक गांव निजाम पट्टी है. अगर इसके दिशा की बात की जाए तो यह भगवान कुश के किले से पूरब दिशा में स्थित है, यहां पर एक शीतला माता मंदिर है. जिसे मठिया भवानी भी कहा जाता है. वर्तमान में यहां पर एक पुजारी का परिवार रहता है. ऐसी मान्यता है कि यह मंदिर भगवान श्री राम के ज्येष्ठ पुत्र कुश की कुलदेवी का है.
प्राकृतिक वातावरण में मौजूद है मंदिर
हालांकि मंदिर उतना अधिक प्रसिद्ध नहीं है जिसकी वजह से यहां पर श्रद्धालु भारी मात्रा में आ सकें लेकिन मंदिर की मान्यता और इतिहास काफी गहरा है. मंदिर परिसर में कई ऐसे फलदार वृक्ष लगाए गए हैं जो पूरे मंदिर को एक प्राकृतिक माहौल देते हैं. यहां पर मंदिर के पीछे एक लखौरी ईंटों से बनी संरचना आज भी मौजूद है जो मंदिर की प्राचीनता बताती है.
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नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें