₹72000 बचाती है एक पेड़ की छांव, जानिए 2.5 करोड़ पेड़ लगाने वाले पीपल बाबा को

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₹72000 बचाती है एक पेड़ की छांव, जानिए 2.5 करोड़ पेड़ लगाने वाले पीपल बाबा को


क्या आप सोच सकते हैं कि एक पेड़ की ठंडी छांव किसी गरीब की जेब में साल के 72 हजार रुपए डाल सकती है? जी हां, यह कोई काल्पनिक बात नहीं बल्कि पूरी तरह गणितीय सच है. पिछले 5 दशकों (50 साल) से अपनी धुन में जी-जान से जुटे स्वामी प्रेम परिवर्तन उर्फ ‘पीपल बाबा’ ने पर्यावरण और आम इंसान के इसी अनोखे आर्थिक रिश्ते को दुनिया के सामने रखा है. राजस्थान, यूपी और उत्तराखंड समेत देश के कई राज्यों की बंजर धरती को हरा-भरा करने वाले पीपल बाबा अब अपने इस अनोखे सफर के अनुभवों को एक किताब के जरिए दुनिया के सामने लेकर आए हैं. उनकी इस किताब का नाम है ‘पीपल की छांव’. मेरठ और नोएडा के पर्यावरण और पुस्तक प्रेमियों का मानना है कि यह किताब हरियाली और पर्यावरण संरक्षण की नई राह दिखाएगी.

ढाई करोड़ पेड़ और ‘छाया का अर्थशास्त्र’
स्वामी प्रेम परिवर्तन उर्फ पीपल बाबा ने लगभग 50 सालों तक जमीनी स्तर पर जी-तोड़ मेहनत की है. उन्होंने करीब 2.70 लाख हेक्टेयर जमीन पर वनस्पति को फिर से जिंदा किया और 2.5 करोड़ से ज्यादा पेड़ लगाए. अपनी इस किताब में उन्होंने बताया है कि पेड़ सिर्फ ऑक्सीजन नहीं देते, बल्कि इनका अपना एक अर्थशास्त्र होता है, जिसे उन्होंने ‘छाया का अर्थशास्त्र’ नाम दिया है.

पीपल बाबा का कहना है कि अगर आप एक पेड़ की छांव की कीमत का अंदाजा लगाएंगे, तो दंग रह जाएंगे. सड़क किनारे रेहड़ी, पटरी और ठेला लगाने वाले गरीबों को यह छांव न सिर्फ धूप और बारिश से बचाती है, बल्कि उन्हें एक मुफ्त ‘वर्कस्पेस’ (काम करने की जगह) भी देती है. अगर इस छांव के बदले उन्हें दुकान का किराया देना पड़े, तो रोज़ के कम से कम 200 रुपये खर्च होंगे. इस तरह एक पेड़ एक गरीब दुकानदार के सालभर में करीब 72,000 रुपये बचाता है.

अमीरों ने नहीं, आम जनता ने दिया साथ
इतने बड़े पैमाने पर पेड़ लगाने के लिए बजट कहां से आया? इस पर पीपल बाबा ने बड़ा ही दिल छू लेने वाला खुलासा किया है. उन्होंने बताया कि इस मुहिम के लिए उन्होंने कोई बड़े कॉर्पोरेट या अमीर लोगों से मदद नहीं ली, बल्कि इसके पीछे देश की आम जनता की ‘क्राउड फंडिंग’ थी. उन्हें दान देने वाले लोग ऑटो-रिक्शा चालक, टैक्सी ड्राइवर, डिलीवरी बॉय, बैंक क्लर्क, सरकारी कर्मचारी, शिक्षक, कारखाने के मजदूर और छोटे दुकानदार थे. किसी ने 10 रुपये दिए, तो किसी ने अपनी पुरानी साइकिल या स्कूटर दान कर दिया, जिससे पौधे और खाद ढोने में मदद मिली. कोई टीम के लिए चाय-बिस्कुट ले आता, तो कोई सिर्फ तालियां बजाकर हौसला बढ़ा जाता. इसी जनता जनार्दन की बदौलत दान की बाल्टी कभी खाली नहीं हुई.

गोबर और कचरे से उगाए जंगल
पीपल बाबा ने बताया कि लोग उन्हें गाय भी दान में देते थे. इस गाय का गोबर उनके लिए सोने जैसा साबित हुआ. वैज्ञानिक तरीके से इस गोबर, रसोई के कचरे और सूखे पत्तों को मिलाकर उन्होंने ऐसी खाद (ह्यूमस) तैयार की, जिसने खराब और बंजर हो चुकी मिट्टी की काया पलट दी. इसी देसी तकनीक से नए-नए जंगलों का जन्म हुआ.

बचपन की यादें और नानी का साथ
किताब में पीपल बाबा ने अपने निजी जीवन के पन्नों को भी पलटा है. उन्होंने बताया कि अपनी नानी की वजह से ही उनका परिचय उत्तराखंड के खूबसूरत जंगलों से हुआ. कॉर्बेट, राजाजी नेशनल पार्क, हरिद्वार, ऋषिकेश, नरेंद्र नगर, टिहरी, उत्तरकाशी, नैनीताल और अल्मोड़ा की वादियों ने उनके भीतर पर्यावरण के प्रति प्रेम जगाया. इसके बाद उनके पिता का तबादला हिमाचल के डलहौजी में हो गया, जहाँ कैंब्रियन हॉल स्कूल में उनकी शुरुआती पढ़ाई हुई. उन्होंने कोलकाता और चंडीगढ़ में भी वक्त बिताया.

जल्द आ रही है किताब ‘पीपल की छांव’
पीपल बाबा ने अपने जीवन के इन्हीं अनुभवों और विचारों को अपनी किताब ‘पीपल की छांव’ में उतारा है. पाठक इसे ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म अमेजन (Amazon) आदि से आसानी से खरीद सकेंगे. पीपल बाबा का साफ संदेश है कि पर्यावरण को बचाने या बदलने की शुरुआत किसी बड़ी संस्था, एयर-कंडीशनर कमरों में होने वाली चर्चाओं या सरकारी नीतियों से नहीं होती. इसकी असल शुरुआत देश के उन साधारण नागरिकों से होती है, जो जमीन पर उतरकर खुद बदलाव बनने का मजबूत फैसला लेते हैं.



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