कौन हैं मऊ के मनोज कुमार? जो गरीबों के अंतिम सफर में बनते हैं सहारा
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Mau News: कहते हैं कि गरीबों के लिए भगवान किसी ना किसी देवदूत को भेज देते हैं. ऐसे ही भगवान के एक दूत हैं मऊ के मनोज कुमार, जो आज लोगों की अंतिम यात्रा में खुद का निशुल्क सहयोग देते हैं. आइए मनोज कुमार की कहानी और उनका सफर जानते हैं.
मऊ: कहते हैं कि लोग बिना स्वार्थ के कोई कार्य नहीं करते, लेकिन यह हर किसी ठीक नहीं बैठता. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो बिना स्वार्थ के ही कुछ ऐसा कार्य कर देते हैं, जो हर किसी के भी चर्चा का विषय बना रहता है. उसी का उदाहरण हैं मऊ जनपद के ठाकुरी पट्टी के निवासी मनोज कुमार, जो आज हर किसी की जुबान पर हैं. वजह जान आप भी हैरान होंगे, आइए जानते हैं क्या है उनकी पूरी कहानी.
निशुल्क 120 से अधिक शव को पहुंचा चुके श्मशान घाट
हम बात कर रहे हैं मऊ जनपद के ठाकुरी पट्टी निवासी मनोज कुमार की, जो एक गरीब परिवार के घर पहुंचे, तो वहां देखा कि शव को श्मशान घाट ले जाने के लिए लोगों से चंदा इकट्ठा किया जा रहा है. वहीं से उन्हें एक आइडिया मिला और वह निशुल्क शव को श्मशान घाट तक पहुंचाने के लिए अपना वाहन भेजने लगे. धीरे-धीरे यह सिलसिला चलता रहा और आज लगभग 120 से अधिक शव को श्मशान घाट तक पहुंचा चुके हैं, जो आज हर किसी के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है. आज के दौर में बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी में लोग इस कार्य के लिए यदि वाहन लेकर जाते हैं, तो हजारों रुपए लेते हैं. लेकिन वह आज भी निशुल्क कार्य कर रहे हैं.
अलग पहचान बनाने के लिए शुरू किया कार्य
लोकल 18 से बात करते हुए मनोज कुमार बताते हैं कि वह पूर्व में जिला पंचायत सरूहुरपुर से प्रत्याशी रहे हैं और वह जब अपनी नई पिकअप वाहन लिए हैं, तब से आज तक वह शव को शमशान घाट तक निशुल्क पहुंचाते हैं. यह समाज सेवा उनके लिए सबसे पहली प्राथमिकता है, जबकि उनके वाहन को अन्य समय उनका ड्राइवर चलाता है. लेकिन जब शव को श्मशान घाट ले जाने की बात आती है, तो वह अपने वाहन को खुद लेकर जाते हैं.
उन्होंने सोचा कि यह कार्य सबसे पुण्य कार्य है, जिस कार्य को करने के लिए अन्य वाहन वाले मोटी वसूली करते हैं. लेकिन वह निशुल्क अपना वाहन लेकर जाते हैं. इससे अन्य वाहन वाले भी उन्हें बोलते हैं कि ऐसा कार्य क्यों करते हो, जिससे उन्हें भी परेशानी होती है. लेकिन इस बढ़ती महंगाई में भी वह पीछे नहीं हटते और आज तक यह कार्य करते चले आ रहे हैं.
शव को श्मशान घाट पहुंचाने से ही शुरू किया कार्य
धीरे-धीरे यह सिलसिला चलता गया और आज स्थिति यह है कि हर किसी के पास हर गांव में उनका नंबर है और जहां किसी की मौत होती है, उस गांव में वह अपना पिकअप वाहन लेकर पहुंच जाते हैं और बिना कुछ लिए अपने ही खर्च से शव को श्मशान घाट तक पहुंचाते हैं.र लोग उन्हें सूचना भी देते रहते हैं, क्योंकि अब सभी को पता है कि यदि उनका वाहन जाएगा तो कोई पैसा नहीं लगता है, ना ही किसी से तेल तक लिया जाता है. आज वह अपने ही खर्च से यह कार्य कर रहे हैं. जब उनका वाहन आया तो शव के माध्यम से ही उन्होंने अपने वाहन को चलाना शुरू किया और अपनी पहचान बनाने के लिए उन्होंने यह कार्य शुरू कर दिया.
12 वर्षों से लगातार कर रहे यह कार्य
2014 में उन्होंने नई पिकअप वाहन ली और 12 साल से लगातार वह अपने वाहन को लेकर शव को शमशान घाट पहुंचाने तक जाते हैं. हालत यह है कि अब उनकी गाड़ी काफी पुरानी हो गई है, फिर भी सिर्फ शव को शमशान घाट तक लेकर जाने के लिए उनकी वाहन बाहर निकालते हैं. उन्होंने यह कार्य इसलिए भी शुरू कर दिया कि उनको एक पहचान बनानी थी और उनकी पहचान आज इसी से है. यही वजह है कि आज भी वह निशुल्क अपने वाहन से शव को शमशान घाट तक पहुंचाते हैं.
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आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.