किरन तिवारी बहराइच में केले के तने से बैग और डलिया बनाकर बनीं आत्मनिर्भर
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किरन देवी ने बताया जब समहू से जुड़ी तो समझ में नहीं आ रहा था. कौन सा बिजनेस किया जाए और फिर जुड़ने के बाद समूह में ट्रेनिंग लेकर इन्होंने केले के तने से तरह-तरह की सामग्री बनाना सिखा जैसे केले के तने का बैग, डलिया और भी कई आइटम और फिर मार्केट में इनकी खूब डिमांड भी होने लगी. जिसकी शुरुआती कीमत 100 रुपये से लगाकर 500 से ₹500 तक जाती है जो अब लोगों को पसंद भी आ रहा है.
बहराइच: जिले के रमपुरवा क्षेत्र में रहने वाली महिला इन दिनों केले के तने से तरह-तरह की उपयोगी सामग्री बनाकर अपनी सफलता की कहानी लिख रही है. 4 साल पहले शुरू हुआ सफर आज आत्मनिर्भरता की कहानी बना हुआ है. अब महसी क्षेत्र की रहने वाली यह महिला जिले की महिलाओं के लिए प्रेरणा बनकर उभर रही है. जाने कहां से आया दिमाग, कैसे शुरू कर दिया केले के तने से सामग्री बनाने का काम.
बहन की नसीहत ने दिखाई रोजगार की नई राह
बहराइच जिले के महसी क्षेत्र के छोटे से गांव रामपुरवा में रहने वाली महिला किरन तिवारी ने बताया कि घर पर फालतू बैठी रहती थी. तब एक दिन छोटी बहन आई और स्वयं सहायता समूह के बारे में बताने लगी तब घर पर राय मशवरा कर सोचा क्यों ना समूह से जुड़कर खाली टाइम में कोई बिजनेस किया जाए और फिर यहीं से शुरू हुआ सफर.
किरन देवी ने बताया जब समहू से जुड़ी तो समझ में नहीं आ रहा था. कौन सा बिजनेस किया जाए और फिर जुड़ने के बाद समूह में ट्रेनिंग लेकर इन्होंने केले के तने से तरह-तरह की सामग्री बनाना सिखा जैसे केले के तने का बैग, डलिया और भी कई आइटम और फिर मार्केट में इनकी खूब डिमांड भी होने लगी. जिसकी शुरुआती कीमत 100 रुपये से लगाकर 500 से ₹500 तक जाती है जो अब लोगों को पसंद भी आ रहा है.
ऐसे करती हैं केले के तने से हैंडमेड आइटम तैयार
किरन देवी ने केले के तने से बनने वाली विभिन्न सामग्री को डिटेल से समझाया है. इन्होंने बताया है सबसे पहले केले का तना लाकर ऊपर से थोड़ा छिल लिया जाता है और फिर इसको थोड़ा सा सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है. फिर डंडे से इसकी पिटाई करके पानी में भिगो भिगोकर इसकी सामग्री गुथकर बना ली जाती है. फिर इसको और ज्यादा मनमोहन टिकाव सुंदर बनाने के लिए इसमें कपड़े आदि से डिजाइन कर दिया जाता है. जिसके बाद यह पूरी तरीके से बनकर तैयार हो जाता है और खास बात यह है कि या नष्ट होते-होते भी पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है. यह सड़कर मिट्टी में ही मिल जाता है. जिसको अगर सही से इस्तेमाल किया जाए तो सालों तक बड़े आराम से चल जाता है. घर की सजावट से लगाकर फल रखने की टोकरी तक सब कुछ बनकर तैयार हो जाता है.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें