OPINION: ‘मगरमच्छ के आंसू बहाने…’ UP चुनाव से पहले चंद्रशेखर से क्यों घबराईं मायावती?

0
OPINION: ‘मगरमच्छ के आंसू बहाने…’ UP चुनाव से पहले चंद्रशेखर से क्यों घबराईं मायावती?


उत्तर प्रदेश की राजनीति में शुक्रवार को एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला. बड़ा इस लिहाज से क्योंकि यूपी जैसे बड़े राज्य में चार बार मुख्यमंत्री का पद संभाल चुकीं मायावती एक नये नवेले युवा सांसद और उसके प्रयास को मगरमच्छ के आंसू बताती नजर आईं. हालांकि मायावती ने नये नवेले सांसद चंद्रशेखर आजाद का नाम तो नहीं लिया, लेकिन जिस अंदाज में उसके प्रयास पर कटाक्ष कीं, उससे ही समझ में आ गया कि बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो किस घबराहट में हैं. आइए पहले जरा दोनों नेताओं के बयान जानते हैं, उसके जरिए पूरे मामले को समझा जा सकता है.

मायावती ने इशारों में चंद्रशेखर को निशाने पर लिया

मेरठ की दलित छात्रा ललिता गौतम हत्याकांड में न्याय की मांग को लेकर आजाद समाज पार्टी के सांसद चंद्रशेखर आजाद अपने समर्थकों के साथ सड़कों पर उतरे हुए हैं. इसको लेकर बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने चंद्रशेखर का नाम लिए बगैर शुक्रवार को मीडिया को संबोधित करते हुए कहा- ‘किसी भी मामले में अपने ऊपर होने वाली जुल्म, जाति के विरुद्ध लड़ाई कानून को अपने हाथ में लेकर नहीं बल्कि, कानून के दायरे में रहकर है. संघर्ष आदि भी कानूनी दायरे के अंदर रहकर ही करना है. यदि मामला अदालत में जाता है और निचली अदालत में इंसाफ नहीं मिलने पर फिर इनको आगे सर्वोच्च अदालत में जाना चाहिए.’

उन्होंने आगे कहा- ‘यह सब व्यवस्था भारतीय संविधान में है ना कि इसके लिए जिला मेरठ, जिला सहारनपुर, जिला प्रयागराज और जिला हरदोई आदि की तरह और आए दिन देश के अन्य राज्यों में भी सड़कों पर उतरना है. जो भी ऐसे संगठन और पार्टियां आदि अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ के लिए इन वर्गों के दुखी व पीड़ित लोगों को भड़काकर व गुमराह करके उन्हें सड़कों पर उतारती है. यह लोग यह जो विभिन्न पार्टियां हैं, संगठन है उन्हें सड़कों पर उतारती है. दुखी पीड़ित लोगों को भड़काकर गुमराह करके पहले ऐसे संगठन व पार्टियां हिंसा व हंगामा व सड़क जाम जैसा बवाल आदि कराती है और फिर उनके मुखिया मगरमच्छ की तरह आंसू बहाने के लिए घटना स्थल पर पहुंचकर अपनी राजनीतिक रोटी सेकते हैं और उससे पीड़ितों को न्याय मिलने वाला नहीं है, बल्कि वर्तमान हालातों में यह इन वर्गों के लोगों की मुसीबत और परेशानी को और भी अधिक बढ़ाने वाला ही है.

बीएसपी सुप्रीमो ने आगे कहा- ‘ऐसे में अपनी समस्याओं का हल परम पूज्य बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के बताए गए सही और शांतिपूर्ण रास्ते पर अर्थात अपनी एकजुटता एवं अपने वोट की ताकत से सत्ता की मास्टर चाबी प्राप्त करना है जो लाख दुखों की बस एक ही दवा है और जिसके लिए बीएसपी लगातार तत्पर व प्रयासरत भी है. इस मार्ग से बिल्कुल भी नहीं भटकना है. इसलिए ऐसे सभी संगठनों व पार्टियों से इन वर्गों के लोगों को खासकर विधानसभा और लोकसभा आम चुनाव के साथ स्थानीय निकायों आदि के भी होने वाले चुनाव के नजदीक जरूर सचेत व सतर्क रहना है. वैसे भी वर्तमान हालातों में इन वर्गों के लोगों को पूना पैक्ट और तथागत गौतम बुद्ध के उपदेशों आदि से भी बहुत कुछ सबक सीखने की जरूरत है. यही मेरी सलाह व पुरजोर अपील भी है.’

चंद्रशेखर ने भी लगे हाथ मायावती को दे दिया जवाब

मायावती ने भले ही नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्होंने उनके प्रयास को मगरमच्छ का आंसू बताया तो उन्होंने भी जवाब देने में देरी नहीं की. प्रदर्शन स्थल पर मायावती को जवाब देते हुए अपने संबोधन में चंद्रशेखर ने कहा- ‘मेरे मन को ठेस इसलिए पहुंची कि आप तो लड़ नहीं रहे, जान की बाजी लगाकर हमारे कार्यकर्ता लड़ रहे हैं. पुलिस से डिटेन हो रहे, गालियां खा रहे और अपना पैसा खर्च कर रहे. तो वो ये कह रहे हैं कि साहब ये मगरमच्छ के आंसू बहा रहे हैं. आप भी आओ ना मगरमच्छ के आंसू बहाने. आओ तो समाज के बीच में.’

चंद्रशेखर ने आगे कहा- ‘वो ऐसा कह रही हैं कि अगर निचली अदालत से न्याय नहीं मिले तो सुप्रीम कोर्ट चले जाओ. तो हमारी बहनों के अस्मत लूटे, उनको नोचा जाए, उसपर पेट्रोल और तेजाब छिड़क दिया जाए. उनको मारा जाए, उनको मार के लटकाया जाए. उनकी पैरों में कील ठोक दी जाए तो हम ये तमाशा देखें कि कब 10 साल बाद न्याय मिलेगा. कब पुलिस कार्रवाई करेगी. हम भी हाथ पर हाथ धरके बैठ जाएं और लड़ाई ना लड़ें. ये वो हमें सिखाना चाह रही हैं. मैं आपसे यह नहीं सीखना चाहता.’

उन्होंने आगे कहा- ‘मैं आपका सम्मान हमेशा करता रहूंगा, लेकिन आज आपने मेरे मन को ठेस जरूर पहुंचाई है. समाज देख रहा है, समाज फैसला करेगा, कि कौन समाज के लिए लड़ रहा है और कौन समाज से केवल वोट का रिश्ता रखता है, इसका फैसला समाज करेगा. ठीक है मैं बड़ी तकलीफ के साथ ये कह रहा हूं.’

2014 के बाद मायावती ने घर से निकलना और बीजेपी पर एक शब्द भी कहना किया बंद

साल 2007 से 2012 तक मायावती ने उत्तर प्रदेश में पूरे शान से पूर्ण बहुमत की सरकार चलाई. उन्होंने लोगों के लाख मना करने पर भी अपने कार्यकाल में करोड़ो रुपये पार्क बनवाने में खर्च किए. सड़कों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में मायावती और उनके बनाये पार्क नकारात्मक सुर्खियों में रहे. इस वजह से उनकी सरकार में लॉ एंड ऑर्डर की सख्ती कहीं पीछे छूट गए और 2012 में एक बार फिर से समाजवादी पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई. 2012 से 2014 तक तो मायावती यदा कदा प्रेस कॉन्फ्रेंस या रैलियों में दिखती रहीं. 2014 के लोकसभा चुनाव में जब नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी को राष्ट्रीय स्तर पर प्रचंड जीत मिली उसके बाद मायावती के तमाम राजनीतिक बयान और फैसले यही इशारा करती रही कि उन्होंने अब हथियार डाल दिए हैं.

2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी का एक भी सांसद नहीं जीता. उसके बाद 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी 312 सीटें अकेले दम पर जीतकर राज्य की सत्ता पर काबिज हुई. वहीं मायावती की बीएसपी केवल 19 सीटों पर सिमटकर रह गई. इतना बड़ा झटका लगने के बाद भी मायावती ने अपने दम पर एक बार फिर से संघर्ष करने के बजाय 2019 में अपने घोर विरोधी समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके लोकसभा चुनाव लड़ीं. इस गठबंधन में मायावती के तो 10 सांसद जीत गए, लेकिन समाजवादी पार्टी 2014 की तरह इस बार भी पांच सांसदों की पार्टी बनी रही.

लोगों को लगा कि इस हार के बाद भी बीएसपी गठबंधन में ही सही कम से कम संघर्ष की राह तो चुनेंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. चुनाव के बाद मायावती ने यह कहकर सपा से गठबंधन तोड़ दिया कि बीएसपी के वोट तो उनको ट्रांसफर हो गए, लेकिन सपा के वोट उन्हें ट्रांसफर नहीं हुए. 2022 के विधानसभा चुनाव में मायावती के केवल एक विधायक जीत पाए. वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर से बीएसपी शून्य पर रही. दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने छोटे दलों से गठबंधन करके बीजेपी के सामने 111 सीटों तक पहुंची और 2024 में तो लोकसभा की 37 सीटें जीतकर ना केवल सबको चौंकाया बल्कि बीजेपी को 240 सीटों पर रोकने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई.

वहीं मायावती की पार्टी बीएसपी चुनाव दर चुनाव ना केवल एकाध सीटों के लिए तरसती रही, बल्कि उनका वोटबैंक भी खिसकर करीब 12 फीसदी पर आ गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में उनके भतीजे आकाश आनंद ने रैलियों में बीजेपी पर सीधे अटैक कर पार्टी के कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने की कोशिश की तो मायावती ने उसके लगाम खींच लिए. लगातार हार पर वह कभी मुस्लिमों पर दोष मढ़ती रहीं तो कभी सपा और कांग्रेस पर. 2014 के बाद देश में तमाम पार्टियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी है, लेकिन मायावती ने कभी उनके खिलाफ एक शब्द नहीं बोलीं. 2027 के आगामी चुनाव को लेकर भी मायावती अपने घर में बैठकर रणनीति तो बना रही हैं, लेकिन अभी तक ऐसे संकेत नहीं मिले हैं कि वह इस बार भी जमीन पर उतरकर पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरने का प्रयास भी करेंगी.

चंद्रशेखर अपने बूते बने नगीना से सांसद

पीएम नरेंद्र मोदी की अगुवाई में देश भर में बीजेपी के उभार के साथ ही मायावती जहां 10-12 सालों से शांत होती जा रही हैं, वहीं चंद्रशेखर आजाद बेहद आक्रामक तरीके से अपने समाज के लिए लड़ते दिख रहे हैं. पेशे से वकील चंद्रशेखर ने पहले भीम आर्मी के नाम से दलित युवाओं का एक संगठन बनाया. मई 2017 में सहारनपुर के शब्बिरपुर गांव में भड़की जातीय हिंसा के खिलाफ चंद्रशेखर ने अपनी भीम आर्मी के कुछ युवाओं को साथ लेकर जमकर विरोध प्रदर्शन किए. यह पहला मौका था जब नेशनल मीडिया में चंद्रशेखर का नाम आया. इस दौरान चंद्रशेखर के खिलाफ रासुका यानी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत मुकदमा भी चला. वह करीब 15 महीने जेल में भी रहे.

जेल से बाहर निकलने के बाद चंद्रशेखर CAA-NRC समेत दलितों पर जहां कहीं भी अत्याचार की खबरें आती वहां पूरी ताकत के साथ विरोध करने पहुंचते रहे. एक तरफ जहां मायावती और बीएसपी राजनीतिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह शांत पड़ी थी, दूसरी तरफ चंद्रशेखर हमेशा अपने आंदोलनों और बयानों को लेकर मीडिया की सुर्खियों में नजर आते रहे. कांशीराम की जयंती पर उन्होंने आजाद समाज पार्टी के नाम से 2020 में राजनीतिक दल बनाया. 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में वह गोरखपुर सीट से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने चुनाव लड़ने पहुंचे. भले ही वह हारे, लेकिन अपने समाज के लोगों को एक मैसेज देने की कोशिश की वह उनकी लड़ाई लड़ेंगे और बीजेपी जैसी बड़ी पार्टी का मुकाबला करने की भी हिम्मत दिखाएंगे.

अपने राजनीतिक सफर में चंद्रशेखर ने मायावती को कई बार अर्जी भेजी की वह उनके साथ मिलकर दलितों की लड़ाई लड़ना चाहते हैं, लेकिन कभी भी तवज्जो नहीं मिली. 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, बीएसपी समेत तमाम दलों के पास गठबंधन प्रस्ताव लेकर पहुंचे, लेकिन हर जगह से उन्हें निराशा ही हाथ लगी. इसके बाद उन्होंने अकेले ही दमखम दिखाने का फैसला लिया और नगीना (सुरक्षित) सीट से अपने दम पर सांसद बनकर सबको चौंका दिया. सांसद बनने के बाद भी चंद्रशेखर शांत नहीं पड़े हैं वह लगातार बिहार, पंजाब जैसे राज्यों में प्रत्याशी उतारकर पार्टी के विस्तार में लगे हैं. साथ ही सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने का प्रयास भी जारी है. लोकसभा में भी जब कभी उन्हें बोलने का मौका मिलता है तो वह चंद मिनटों में भी जोरदार तरीके से अपने समाज की बात रखते नजर आते हैं.

क्या चंद्रशेखर से डर गई हैं मायावती?

मायावती चार बार की मुख्यमंत्री हैं, उनके पास काडर बेस पार्टी है. इसके बाद भी वह राजनीतिक रूप से कहीं भी फ्रंट पर नजर नहीं आ रही हैं. वजह क्या है, ये तो वही जानती होंगी. यहां तक कि मायावती ने चुनावों में धुआंधार रैलियां करना भी बंद कर चुकी हैं. मायावती के इन्हीं बर्ताव के चलते यूपी का गैर जाटव दलित पहले ही दूर हो चुका है. अब वह अपनी बीएसपी को कैसे चलाना चाहती हैं ये तो आगामी चुनाव में में उनके प्रदर्शन में दिख जाएगा. दूसरी तरफ मायावती की और बीएसपी की खामोशी से जो स्पेस बना है उसमें चंद्रशेखर अपने लिए जगह तलाशते नजर आ रहे हैं. उनकी शैली भले ही आक्रामक है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि उन्होंने अब तक राजनीतिक और सामाजिक रूप से जो कुछ भी हासिल किया है वो केवल उनकी मेहनत और संघर्ष का नतीजा है.



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *