‘टोपी-दाढ़ी छोड़ो…’ पूर्व IAS की मुसलमानों को सलाह पर भड़के मौलाना मदनी

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‘टोपी-दाढ़ी छोड़ो…’ पूर्व IAS की मुसलमानों को सलाह पर भड़के मौलाना मदनी


Muslim Identity Row: मुसलमानों के खिलाफ हो रही भीड़ हिंसा (Mob Lynching) के मामलों पर इन दिनों एक नई बहस छिड़ गई है. हाल ही में पूर्व IAS अधिकारी नियाज़ खान ने मुसलमानों को एक विवादित सलाह दी थी. उनका कहना था कि मुसलमान अपनी सुरक्षा के लिए दाढ़ी-टोपी जैसी पारंपरिक पहचान छोड़ दें. पूर्व अफसर की इस नसीहत पर अब जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी का गुस्सा फूट पड़ा है. मौलाना मदनी ने इस सलाह को पूरी तरह से बकवास, अफसोसजनक और तथ्यों से परे बताया है.

मौलाना मदनी ने कड़े शब्दों में प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा मुसलमानों को ऐसी सलाह देना बेहद चिंताजनक है. उन्होंने साफ कहा, ‘समस्या पीड़ित की दाढ़ी, सिर की टोपी, हिजाब या कुर्ता-पाजामा में नहीं है. असली बीमारी तो हमलावर के दिमाग में भरी नफरत है.’ मदनी ने सवाल उठाया कि उस माहौल पर बात क्यों नहीं होती जहां भीड़ खुद को कानून से ऊपर समझने लगती है? अपराधी को रोकने और सजा देने के बजाय पीड़ित को ही अपनी पहचान मिटाने के लिए कहना कहां का इंसाफ है? दुनिया का कोई भी सभ्य लोकतांत्रिक देश इसकी इजाजत नहीं दे सकता.

83% पीड़ितों ने पहने थे आम कपड़े

अपनी बात को तर्कपूर्ण बनाते हुए मौलाना मदनी ने एक शोध रिपोर्ट का हवाला दिया. उन्होंने बताया कि पिछले 10 सालों में हुई भीड़ हिंसा की 38 प्रमुख घटनाओं में से 83 प्रतिशत मामलों में पीड़ितों ने बिल्कुल सामान्य कपड़े पहने थे. उनकी बाहरी वेशभूषा से कोई स्पष्ट इस्लामी पहचान जाहिर नहीं हो रही थी. दादरी में मोहम्मद अखलाक (2015), अलवर में रकबर खान (2018), हापुड़ में कासिम कुरैशी, झारखंड में तबरेज अंसारी (2019), और हाल ही में हरियाणा के चरखी दादरी में साबिर मलिक की बर्बर हत्या का जिक्र करते हुए मदनी ने कहा कि इनमें से किसी की भी हत्या उनके इस्लामी पहनावे के कारण नहीं हुई थी, बल्कि कोरी अफवाहों के कारण की गई थी.

बोस्निया के खौफनाक इतिहास का दिया उदाहरण

मौलाना मदनी ने इतिहास का पन्ना पलटते हुए बोस्निया का खौफनाक उदाहरण पेश किया. उन्होंने कहा कि बोस्निया के मुसलमान भाषा, कपड़े और रहन-सहन में बिल्कुल अपने ईसाई पड़ोसियों जैसे ही लगते थे, इसके बावजूद उन्हें सामूहिक नरसंहार और जुल्म का सामना करना पड़ा. मदनी ने कहा, ‘जब किसी समुदाय के खिलाफ जानबूझकर नफरत पैदा की जाए, तो सिर्फ पहचान बदलना कभी भी सुरक्षा की गारंटी नहीं बन सकता.’

कपड़ों पर नहीं, सख्त कानून पर फोकस हो

जमीअत अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि असली सवाल यह होना चाहिए कि आखिर भीड़ को किसी नागरिक का नाम पूछने, गाड़ी रोकने और उसे मारने की हिम्मत कैसे मिल रही है? उन्होंने कहा कि अगर फोकस कपड़ों पर करेंगे तो हिंसा का दोष अपराधी के बजाय पीड़ित पर आ जाएगा. मौलाना मदनी ने सरकार से सख्त अपील की है कि देश में सुप्रीम कोर्ट (तहसीन एस. पुनावाला केस) के निर्देशों और भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(2) को पूरी सख्ती से लागू किया जाए. अपराधियों को सजा मिलने से ही इस नफरत का अंत होगा.

पूर्व IAS अधिकारी नियाज़ खान ने मुसलमानों को क्या सलाह दी थी?
पूर्व IAS नियाज़ खान ने मुसलमानों को सलाह दी थी कि भीड़ हिंसा (मॉब लिंचिंग) से बचने के लिए वे दाढ़ी-टोपी और अपनी पारंपरिक वेशभूषा पहनना छोड़ दें और अपनी पहचान छिपा लें.

मौलाना महमूद मदनी ने पूर्व IAS की सलाह का क्या जवाब दिया?
मौलाना मदनी ने इस सलाह को गलत और अफसोसजनक बताते हुए कहा कि समस्या मुसलमानों के कपड़ों (दाढ़ी-टोपी) में नहीं, बल्कि हमलावर की मानसिकता और उसके दिमाग में भरी नफरत में है.

जमीअत उलमा-ए-हिंद के अनुसार भीड़ हिंसा को रोकने का असली समाधान क्या है?
मौलाना मदनी के अनुसार, इसका असली समाधान पहचान छिपाना नहीं, बल्कि देश में कानून का राज स्थापित करना, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सख्ती से पालन करना और भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(2) के तहत अपराधियों को सख्त सजा दिलाना है.



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