क्या यूपी चुनाव 2027 में बड़ा दांव खेलने जा रहे नीतीश कुमार?
लखनऊ. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक दलों की जोड़-तोड़ और रणनीतिक घेराबंदी अभी से तेज हो गई है. उत्तर प्रदेश की सत्ता पर तीसरी बार काबिज होने की कोशिश में जुटी भारतीय जनता पार्टी के सामने सिर्फ सपा-कांग्रेस ही चुनौती नहीं है, बल्कि उसके अपने सहयोगी दल भी अब सिरदर्द बनने लगे हैं. पहले लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान द्वारा यूपी में चुनाव लड़ने के ऐलान से बीजेपी असहज थी, अब बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने भी लखनऊ में अपनी सीधी दस्तक दे दी है. नीतीश कुमार के बेहद खास और बिहार सरकार के कद्दावर मंत्री और जेडीयू के यूपी प्रभारी श्रवण कुमार आज लखनऊ पहुंच गए हैं. उनका यह दौरा यूपी की उन सीटों पर जेडीयू की चुनावी तैयारियों का जायजा लेने के लिए है, जहां पार्टी 2027 के महामुकाबले में अपने उम्मीदवार उतारने का मन बना रही है.
एक तरफ नीतीश कुमार दिल्ली में अपने नए घर में पूजा कराने पटना से दिल्ली पहुंचे हैं. वहीं दूसरी तरफ उनके खासमखास श्रवण कुमार लखनऊ पहुंच गए हैं. जेडीयू के इस आक्रामक रुख से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या बिहार के ये सहयोगी दल यूपी में बीजेपी की मुश्किलें बढ़ाएंगे या यह सिर्फ गठबंधन में ज्यादा सीटें झटकने की ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ है?
साल 2022 के यूपी चुनाव में क्या हुआ था जेडीयू का हश्र?
अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें और साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर नजर डालें, तो उस समय भी जेडीयू ने बीजेपी से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया था. 2022 के चुनाव में जेडीयू ने उत्तर प्रदेश की कुल 27 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. पार्टी ने मुख्य रूप से पूर्वांचल और बुंदेलखंड के उन इलाकों पर फोकस किया था जहां कुर्मी-पटेल मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है.
2022 में जेडीयू का क्या हश्र हुआ था?
2022 का चुनाव जेडीयू के लिए एक बड़ा सियासी झटका साबित हुआ था. पार्टी उत्तर प्रदेश में अपना खाता तक नहीं खोल सकी थी. इतना ही नहीं, जेडीयू के लगभग सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी और पार्टी को कुल मिलाकर महज 0.11% वोट शेयर ही हासिल हो सका था.
चंदा चोरी पर यूपी में पॉलिटिक्स
चिराग के बाद नीतीश का दांव के मायने
2022 के बेहद खराब प्रदर्शन के बावजूद साल 2027 का यूपी चुनाव बिल्कुल अलग होनने वाला है. इस बार के चुनाव में एसपी-कांग्रेस का पीडीए वाला दांव बीजेपी खेमे में चिंता का करण बना हुआ है. क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार जेडीयू और लोजपा (रामविलास) जैसे सहयोगियों के बैसाखी के दम पर टिकी है. हालांकि, बंगाल में बीजेपी सत्ता में आते ही बीजेपी को अब जेडीयू या टीडीपी जैसे दलों की बैसाखी की जरुरत नहीं है. ऐसे में जेडीयू और एलजेपी जैसे दल अब यूपी की राजनीति में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं.
बीजेपी के लिए कितनी बड़ी चुनौती?
चिराग पासवान पश्चिमी यूपी और पूर्वांचल के दलित बहुल इलाकों में रैलियां कर अपना आधार बढ़ाना चाह रहे हैं. ऐसे में बीजेपी के पारंपरिक गैर-जाटव दलित वोट बैंक में बिखराव का डर सता रहा है. वहीं नीतीश कुमार की जेडीयू पूर्वांचल और सेंट्रल यूपी की कुर्मी (लव-कुश समीकरण) सीटों पर अपनी दावेदारी मजबूत करना चाहती है. अगर जेडीयू इन इलाकों में गठबंधन के बिना चुनाव लड़ती है तो अनुप्रिया पटेल अपना दल-एस के साथ जेडीयू का टकराव और बीजेपी पर दबाव बढ़ सकता है.
जेडीयू के यूपी प्रभारी श्रवण कुमार ने कहा कि पार्टी यूपी चुनाव की 25 सीटों पर लड़ने की तैयारी कर रही है.
जेडीयू के निशाने पर कौन-कौन छोटे दल?
ऐसे में श्रवण कुमार का लखनऊ आना इसी ‘मिशन 2027’ का हिस्सा है. जेडीयू इस बार पूर्वांचल की उन सीटों पर दावा ठोकने की तैयारी में है जहां नीतीश कुमार की बिरादरी कुर्मी का बड़ा प्रभाव है. राजनीतिक पंडितों और विश्लेषकों का मानना है कि जेडीयू या लोजपा जैसी पार्टियां यूपी में सरकार बनाने के लिए चुनाव नहीं लड़ रही हैं. यह पूरी तरह से एक सोची-समझी प्रेशर पॉलिटिक्स का हिस्सा है.
कुलमिलाकर नीतीश कुमार अच्छी तरह जानते हैं कि अकेले चुनाव लड़ने पर 2022 जैसा हश्र दोबारा हो सकता है. इसलिए उनका असली मकसद बीजेपी पर दबाव बनाकर एनडीए गठबंधन के तहत यूपी में 5 से 7 सम्मानजनक सीटें हासिल करना है. अगर बीजेपी उन्हें गठबंधन में जगह नहीं देती है, तो जेडीयू अकेले उम्मीदवार उतारकर बीजेपी के वोटों में सेंध लगा सकती है, जिसका सीधा फायदा अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को मिल सकता है. यही वजह है कि अमित शाह और योगी आदित्यनाथ की जोड़ी को अब अपने इन सहयोगियों को साधने के लिए एक नया सीट शेयरिंग फॉर्मूला तैयार करना होगा.