मेरठ का फिरोजपुर शिव मंदिर, जहां स्वयंभू शिवलिंग पर गाय करती थी दूधाभिषेक
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Meerut Shiv Temple: मेरठ के बहसूमा क्षेत्र के फिरोजपुर स्थित प्राचीन शिव मंदिर को महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है. मान्यता है कि यहां स्वयंभू शिवलिंग है, जिस पर कभी एक गाय प्रतिदिन दूधाभिषेक करती थी. मंदिर की एक खास बात यह भी है कि यहां आज तक छत नहीं बन पाई है. सावन और कांवड़ यात्रा के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक करने पहुंचते हैं.
सावन माह की शुरुआत हो गई है, ऐसे में एक तरफ जहां आपको भोले भक्त कांवड़िया हरिद्वार, गंगोत्री, ऋषिकेश सहित विभिन्न स्थानों से जल लाते हुए अपने-अपने गृह जनपद जाते हुए दिखाई देंगे. वहीं दूसरी ओर शिवालय में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं पूजा अर्चना कर रहे हैं.
ऐसे में सावन का सोमवार भी आने वाला है. जिसमें देखने को मिलता है श्रद्धालु विधि विधान के साथ भगवान भोलेनाथ की पूजा अर्चना करते हैं. ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ की बात करें तो मेरठ में भी आपको विभिन्न ऐसे ऐतिहासिक और धार्मिक शिवालय देखने को मिलेंगे. जिनका इतिहास रामायण कालीन युग से लेकर महाभारत कालीन युग तक माना जाता है.
कुछ इसी तरह का उल्लेख मेरठ के बहसूमा क्षेत्र स्थित फिरोजपुर के प्राचीन शिव मंदिर का भी माना जाता है. हस्तिनापुर से संबंधित विभिन्न पहलुओं के एक्सपर्ट शोभित विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर प्रियंक भारती के अनुसार यह प्राचीन शिव मंदिर महाभारत कालीन ही माना जाता है. उन्होंने बताया कि महाभारत युद्ध के दौरान पांडवों की माता कुंती और कौरवों की माता गांधारी इस स्थान पर तप कर रहे दुर्वासा ऋषि से अपने-अपने पुत्रों के विजय श्री का आशीर्वाद लेने के लिए आई थी.
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उन्होंने बताया कि मंदिर की प्रति मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से भगवान भोलेनाथ की शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं. उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है.
क्योंकि यह शिवलिंग स्वयं शंभू माना जाता है. उन्होंने बताया कि एक दौर की बात है कि जब ग्वाला अपनी गाय को चराने जंगल की तरफ आता था. तो प्रतिदिन एक गाय वहां से निकलकर भगवान भोलेनाथ की शिवलिंग पर दूधाभिषेक करने के लिए जाती थी.
एक दिन ग्वाले ने गाय का पीछा किया तो वह आश्चर्य चकित हो गया. क्योंकि वह गाय प्रतिदिन की तरह ही जंगल में बने शिवलिंग पर दूधाभिषेक कर रही थी. जब गांव में इस बात की चर्चा हुई तो उसे दौर में सबसे प्रभावशाली व्यक्ति हैदर अली ने शिवलिंग के आसपास खुदाई कर शिवलिंग को निकलना चाहा. लेकिन जितनी भी खुदाई इस शिवलिंग के आस पास की जाती थी. उतना ही यह नीचे होता चला जाता था. इससे क्रोधित होकर हैदर अली ने फिर इस शिवलिंग को समाप्त करने के लिए काटने के निर्देश दिए.
लेकिन वह सफल नहीं हो पाया. जिसके निशान आज भी शिवलिंग पर आपको देखने को मिलेंगे. उसके पश्चात भी वह प्रयास करता रहा जिसमें वह हमेशा ही असफल रहा.
उसके बाद जमींदारी प्रथा समाप्त हो गई. जिस कारण हैदर अली इस गांव से चला गया था. उसके बाद फिर गांव के लोगों के द्वारा पास से ही रामराज से निकलने वाली गंगा के जल से शिवलिंग का जलाभिषेक करते हुए यहां पर प्राचीन शिव मंदिर की स्थापना की थी.
इसलिए धार्मिक दृष्टि से इस मंदिर को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. उन्होंने बताया कि हर साल कांवड़ यात्रा के दौरान यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं आपको जलाभिषेक करते हुए भी दिखाई देंगे. वहीं सावन के सोमवार में भी यहां श्रद्धालु घंटों तक लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतजार करते हुए नजर आते है. क्योंकि जो भी श्रद्धालु है सच्चे मन से भगवान भोलेनाथ के स्वयं शंभू शिवलिंग की पूजा अर्चना करते हैं. उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
दरअसल इस मंदिर से एक अनोखी किंवदंती भी जुड़ी हुई है. इस मंदिर के ऊपर छत नहीं है. कई बार छत डालने का प्रयास किया गया. लेकिन कोई ना कोई ऐसी विषम परिस्थिति उत्पन्न हो गई. जिस कारण छत नहीं डाल पाई. बताते चले कि फिरोजपुर क्षेत्र भी महाभारत कालीन हस्तिनापुर का हिस्सा माना जाता है. ऐसे में अगर आप हस्तिनापुर भी जाएंगे तो आपको और भी ऐसे शिवालय देखने को मिलेंगे जिनका इतिहास हजारों वर्ष पुराना है.