कारगिल युद्ध में आजमगढ़ के रामसमुझ यादव नें 21 पाकिस्तानी सैनिक मार हो गए शहीद, जानें
Last Updated:
कारगिल युद्ध 30 अगस्त 1999 के दिन शून्य से नीचे तापमान और बर्फीली पहाड़ियों के बीच रामसमुझ यादव और उनके साथियों ने दुश्मनों पर धावा बोल दिया. महज 22 साल की उम्र में अपने जज्बे और अदम्य साहस का परिचय देते हुए उन्होंने लगभग 21 पाकिस्तानी सैनिकों को ढेर कर दिया था, और चोटी को दुश्मनों के कब्जे से छुड़ाकर तिरंगा लहराया था. लेकिन इस घमासान युद्ध में वह गंभीर रूप से घायल हुए और वीरगति को प्राप्त हो गए.
आजमगढ़: 1999 में हुए कारगिल युद्ध में देश की रक्षा में अपने प्राणों को न्योछावर करने वाले वीरों की गाथाएं आने वाली पीढियां को सदैव देशभक्ति और देश प्रेम की प्रेरणा देती है, ऐसी ही एक शौर्य गाथा उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद के सगड़ी तहसील क्षेत्र के अंतर्गत नाथूपुर गांव की भी है, जहां के 22 वर्षीय वीर जवान ने देश की रक्षा में अपने जन्मदिन के दिन ही दुश्मनों से लोहा लेते हुए देश की रक्षा में शहीद हो गए. 30 अगस्त 1999 का दिन आजमगढ़ के नाथूपुर गांव के लिए बेहद ही गर्व और संवेदनाओं से भरा होता है इस दिन गांव में जन्मे राम समुझ यादव ने अपने 22वें जन्मदिन के दिन ही कारगिल युद्ध में बर्फीली पहाड़ियों के बीच देश की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान देते हुए अमर हो गए थे.
1996 में सेना में हुए शामिल
शहीद रामसमुझ यादव का परिवार विषम आर्थिक परिस्थितियों और गरीबी में गुजर रहा था. उनके परिवार में माता-पिता के अलावा तीन भाई बहन भी थे, घर का बड़ा बेटा होने के कारण इन सभी की जिम्मेदारी भी रामसमुझ यादव के कंधे पर ही थी. उनके मन में बचपन से ही भारतीय सेना में शामिल होकर भारत माता की सेवा करने और देश के लिए कुछ गुजरने की जुनून था. शहीद रामसमुझ यादव के भाई प्रमोद यादव लोकल18 से बातचीत करते हुए बताते हैं कि सन 1996 में उनके भाई भारतीय सेना में शामिल हुए और बनारस से 13 कमाऊ रेजीमेंट में भर्ती हुए थे.
सियाचिन ग्लेशियर में थी तैनाती
बहादुरी और देश सेवा के जुनून के बल पर महज दो साल के भीतर ही उनकी पहली तैनाती दुनिया के सबसे कठिन और बर्फीले युद्ध क्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर पर हो गई. सियाचिन ग्लेशियर पर अपनी ड्यूटी पूरा करने के बाद जब उनकी बटालियन नीचे उतरी और उनकी तैनाती चंडीगढ़ में हुई तभी कारगिल युद्ध छिड़ गया और इसी दौरान एक बार फिर उनकी ड्यूटी कारगिल में मोर्चा संभालने के लिए लग गई. रामसमुझ यादव की टुकड़ी को कारगिल के सबसे महत्वपूर्ण और दुर्गम पॉइंट 5685 पर पाकिस्तानी घुसपैठियों के कब्जे से मुक्त करने की जिम्मेदारी दी गई थी.
22 साल की उम्र में 21 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया
30 अगस्त 1999 के दिन शून्य से नीचे तापमान और बर्फीली पहाड़ियों के बीच रामसमुझ यादव और उनके साथियों ने दुश्मनों पर धावा बोल दिया महज 22 साल की उम्र में अपने जज्बे और अदम्य साहस का परिचय देते हुए उन्होंने लगभग 21 पाकिस्तानी सैनिकों को ढेर कर दिया था और चोटी को दुश्मनों के कब्जे से छुड़ाकर तिरंगा लहराया था, लेकिन इस घमासान युद्ध में वह गंभीर रूप से घायल हुए और वीरगति को प्राप्त हो गए. प्रमोद यादव बताते हैं कि रामसमुझ यादव के जाने का गम उनके परिवार के लिए बेहद गहरा था उनकी मां और बहन कई महीनो तक गहरे शोक में रहीं.
उनके गांव में हर वर्ष 30 अगस्त को उनकी पुण्यतिथि का भव्य कार्यक्रम आयोजित किया जाता है इस दौरान वहां शहीद मेला लगता है और दूर-दूर से लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए आते हैं. वह बताते हैं कि घर की पारिवारिक स्थिति खराब होने के साथ-साथ घर के बड़े बेटे का इस तरह से गुजर जाना परिवार के लिए बेहद संवेदनशील और सदमें में जैसा था, हालांकि भाई की शहादत के बाद केंद्र सरकार के द्वारा कारगिल शहीदों के आश्रितों को दी जाने वाली सहायता योजना के तहत उनके परिवार को भी सहायता प्राप्त हुई थी.
जिसमें रामसमुझ यादव की माता जी के नाम गैस एजेंसी और कृषि योग्य भूमि आवंटित की गई थी. आज इसी गैस एजेंसी के जरिए उनका पूरा परिवार गुजर बसर कर रहा है. परिवार में भाई के साथ-साथ उनके माता और पिता भी रह रहे हैं.
About the Author
Rajnish Kumar Yadav is a digital journalist and content publisher with over seven years of experience in print and digital media. He is currently working with News18 Digital (Local18) as a Content Publisher, wh…
और पढ़ें