प से पंडित, ब से ब्राह्मण की याद ‘अ’ से अखिलेश यादव को क्यों आ रही?
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पीडीए में पीडी पंडित का ही शॉर्ट फॉर्म है. अखिलेश यादव ने पीडीए का पी बदल दिया है. सबसे पहले PDA के A का मतलब कई बार बदला. अल्पसंख्यक के साथ परिभाषा में अगड़े जोड़े गए. फिर अन्य भी ए के साथ आ गए. लेकिन पी से पिछड़ा के अलावा पंडित पहली बार हुआ है. डी है बीच का दलित, वो कभी नहीं बदलेगा. ये मैं बता रहा हूं.
अखिलेश यादव.
लेकिन अखिलेश यादव पी से पंडित हो कर क्यों रहे हैं? ब से ब्राह्मण कर क्यों कह रहे हैं? ये समझना जरूरी है और ये ठाकुर बनाम ब्राह्मणों की जो कल्पित लड़ाई यूपी में है उससे भी संबंधित है.अखिलेश यादव फार्मूला अपनाने जा रहे हैं मायावती का. 2007 वाला हिट फार्मूला. तो सबसे पहले ये समझेंगे कि 2007 में मायावती ने ऐसा क्या किया था. मायावती ने जो टिकट वितरण किया उसमें से 93 से 95 उम्मीदवार दिए दलित समाज से. उसमें से ज्यादातर जाटव समाज के थे. इसमें से 60 जीत भी गए. फिर अन्य पिछड़ा वर्ग पर इन्होंने काफी फोकस दिया. 2007 में लगभग 110 से 15 उम्मीदवार ओबीसी थे. इनमें गैर यादव ओबीसी ज्यादा थे – कुर्मी, लोध, निषाद, कुशवाहा, मौर्य. सपा के ओबीसी में सेंध लगाने की तैयारी थी. लेकिन सबसे बड़ा दांव खेला था मायावती ने ब्राह्मणों पर. ब्राह्मण चल शंख बजाएगा, हाथी चलता जाएगा. तो इस तरह के जुमलों के बीच ब्राह्मणों को मायावती ने 86 सीटें दी. राजपूतों को 30 और कायस्थ समेत बाकी सवर्णों को लगभग 20. दलित ब्राह्मण गठजोड़ हिट साबित हुआ. मायावती ने मुसलमानों को भी नाराज नहीं किया और 60 उम्मीदवार उतार दिए. समाजवादी पार्टी से असंतुष्ट मुसलमानों,गैर यादव ओबीसी और ब्राह्मणों ने बसपा की सरकार बनवा दी. बसपा ने 403 में 206 सीटें हासिल की.
फिर 2012 में क्या हुआ. मायावती का जो सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय वाला मॉडल था वो फेल हो गया. अखिलेश यादव ने गेम पलट दिया. अखिलेश ने क्या किया? यादवों को लगभग 60 सीटें दी गई और मुसलमानों को थोड़ा ज्यादा. मैसेज ये दिया कि हम सिर्फ यादव तक सीमित नहीं है और मुसलमान हमारे लिए अहम थे, अहम रहेंगे. ओबीसी और अगड़ों को साधने के लिए उनकी आबादी के अनुपात को देखते हुए टिकट बांटे गए. इसका बड़ा फायदा हुआ और अखिलेश यादव 224 सीटों के साथ सरकार बना ले गए.
एक साल भी अखिलेश राज के नहीं हुए और नरेंद्र मोदी बीजेपी के पीएम उम्मीदवार घोषित कर दिए गए. 2013 में मुजफ्फरनगर में कवाल कांड के बाद दंगे भड़के और कैराना में हिंदुओं के पलायन का मामला सामने आया. चुनाव नजदीक आया तो अमित शाह ने यूपी की कमान संभाली. उन्होंने बूथ लेवल पर पन्ना प्रमुखों की नियुक्ति की और पूरे प्रदेश में छोटे-छोटे इलेक्ट्रॉनिक वाहन रवाना कर दिए. इनसे दिन रात गुजरात के विकास पुरुष मोदी की उपलब्धियां लोगों तक पहुंची. धीरे-धीरे भारतीय जनता पार्टी पैठ बनाती गई पूरे प्रदेश में. अखिलेश चाहते तो कोर्स करेक्शन कर सकते थे लेकिन नहीं हो पाया. योगी आज भी कहते हैं – ये तो 12 बजे उठते हैं, 5 बजे जिम जाते हैं, 7 बजे के बाद इनको दुनिया नजर नहीं आती.
तो इस तरीके से अखिलेश की जो छवि थी वो बिगड़ती चली गई और हिंदुओं में एक तरीके से कंसोलिडेशन हुआ. 2017 के चुनाव में योगी जी 312 सीटों के साथ बाजी मार ले गए और 47 पर सिमट गई समाजवादी पार्टी. अब अगर आप फिर से ये देखेंगे कि ब्राह्मणों ने कब-कब किन चुनावों में किसको कितने वोट किए तो आपको सारा गणित समझ में आ जाएगा. कैसे भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में ब्राह्मणों का वोट शेयर 42 प्रतिशत से बढ़ते-बढ़ते 2022 में 89 प्रतिशत पर पहुंच गया. इस दौरान बहुजन समाजवादी पार्टी सिमटती चली गई और 2022 में तो एक सीट पर सिमट गई. गैर जाटव वोटों के छिटकने का असर दिखा पिछले चुनाव में. वो वोटर सपा की तरफ गया. फिर जाट वाला फैक्टर आया किसान आंदोलन के कारण. जाटों, मुसलमानों और गैर जाटव दलितों ने अखिलेश के लिए वोट किया जिसके कारण 100 से ज्यादा सीटें समाजवादी पार्टी ले आई.
अब जब अगला चुनाव पास है तब अखिलेश यादव को क्यों लग रहा कि ब्राह्मण उनके साथ होगा. ये कारण रोचक है और यह निर्णायक भी हो सकता है. सबसे पहला तो कारण है ठाकुर बनाम ब्राह्मण की राजनीति. एक धारणा चल रही है कि ठाकुरों का वर्चस्व है और ब्राह्मणों को किनारे किया जा रहा है. अब पंडित मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र जैसे वरिष्ठ नेताओं के राजनीति से हटने के बाद ऐसा कोई बड़ा ब्राह्मण चेहरा नहीं दिख रहा जो पूरे प्रदेश में ब्राह्मणों का निर्विवाद प्रतिनिधित्व कर सके. इसके अलावा विकास दुबे एनकाउंटर, उसके बाद हुए कुछ और एनकाउंटर और पड़ोसी बिहार में भारत भूषण तिवारी का एनकाउंटर. सॉरी इसे हत्या ही कहेंगे. इन सबके कारण एक मोबिलाइजेशन ब्राह्मणों में हुआ है कि हमारी उपेक्षा हो रही है. स्थानीय स्तर पर जो दर्ज हो रहे हैं मुकदमे उसमें भी पक्षपात की शिकायत ब्राह्मण समाज कर रहा है. एक और बड़ा कारण है भाजपा का गैर जाटव दलित और अन्य ओबीसी समाज को अपने साथ जोड़ने की लगातार कोशिश करना जिसके चक्कर में यूजीसी जैसे रेगुलेशन आए. इससे भी सवर्ण समाज और खासतौर पर ब्राह्मण नाराज महसूस कर रहा है.
और जब ब्राह्मणों ने अपने लिए, अपने अधिकारों के लिए बैठक बुलाई तो उन्हें कायदे से रगड़ दिया गया. याद होगा बीजेपी विधायक पीएन पाठक ने दिसंबर 2025 में एक रात्रि भोज किया. इसमें 40-45 ब्राह्मण विधायक आए. तबके प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी उनको ऐसा न करने की नसीहत दी. इसके अलावा ऐतिहासिक धार्मिक सांस्कृतिक मंच जैसे परशुराम जयंती, मंदिर हो, तीर्थ प्रबंधन बोर्ड हो उस पर निर्णय लेते समय ब्राह्मण समाज का कहना है कि हमें अनदेखा किया जाता है. तो ये सारे ऐसे नाराजगी के मुद्दे हैं जिसको लेकर अखिलेश यादव को एक उम्मीद जगी है. इसीलिए पीडीए का पी बदल गया.
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Alok Kumar is a senior journalist and digital media leader with over two decades of experience across television, radio, and digital news platforms. He currently serves in a leadership role at News18 Hi…
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