दूध देने वाले पशुओं में तेजी से फैल सकता है थनैला रोग, जानें बचाव का सही तरीका
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बरसात के मौसम में दुधारू पशुओं में थनैला रोग यानी मास्टाइटिस का खतरा बढ़ सकता है. पशु के थन में सूजन, गर्माहट, दर्द और दूध में बदलाव इसके प्रमुख संकेत हैं. पशुपालक पशुशाला को साफ, सूखा और हवादार रखने के साथ दूध दुहने के बाद कुछ समय तक पशु को खड़ा रखकर संक्रमण से बचाव कर सकते हैं.
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी समेत आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में किसान दुधारू पशुओं का पालन करते हैं. पशुपालन किसानों की अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण साधन है. हालांकि बरसात और बदलते मौसम में पशुओं में कई तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. इनमें थनैला रोग (मास्टाइटिस) दुधारू पशुओं के लिए गंभीर समस्या माना जाता है. इस बीमारी का सीधा असर पशु के थन, दूध की गुणवत्ता और दूध उत्पादन पर पड़ता है.
थनैला रोग मुख्य रूप से पशु के थन में होने वाला संक्रमण है. इसमें थन की एक या अधिक गांठों में सूजन, गर्माहट, दर्द और दूध में बदलाव दिखाई दे सकता है. कई बार बीमारी इतनी तेजी से बढ़ती है कि पशु दूध निकालने में परेशानी महसूस होती है. गंभीर स्थिति में दूध उत्पादन काफी कम हो जाता है और पशु को लंबे समय तक उपचार की जरूरत होती है. इसलिए पशुपालकों के लिए जरूरी है कि वे बीमारी के शुरुआती लक्षणों को पहचानें और समय रहते पशु चिकित्सक से सलाह लें.
थनैला रोग को मास्टाइटिस कहा जाता है पशुओं के थन में सूजन और संक्रमण की स्थिति होती है. सामान्य तौर पर यह रोग बैक्टीरिया समेत कुछ अन्य सूक्ष्मजीवों के कारण हो सकता है. संक्रमण थन की नलिका के रास्ते अंदर पहुंच सकता है. गंदा फर्श, दूषित पानी, गंदे हाथ, गंदे दूध निकालने के उपकरण और पशु के थन की ठीक से सफाई न होना इसके जोखिम को बढ़ा सकते हैं.
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थनैला रोग के शुरुआती लक्षणों को पहचानकर समय पर उपचार कराने से बीमारी को होने से रोका जा सकता है. पशुपालक दूध निकालते समय नियमित रूप से पशु के थन की सफाई करें. थनैला रोग होने के कारण सूजन आ जाती है. कई बार पशु दूध निकालने के दौरान पैर मारने की कोशिश करता है, क्योंकि थन में दर्द होता है.
थनैला मुख्य रूप से एक जीवाणु जनित रोग है, जो थन और अयन को प्रभावित करता है. यदि सही समय पर इसकी पहचान और रोकथाम न की जाए, तो पशु का दूध उत्पादन क्षमता हमेशा के लिए प्रभावित हो सकती है थनैला रोग से ग्रसित पशु के दूध उत्पादन में 50% से लेकर 100% तक की कमी आ सकती है.
बरसात के मौसम में पशु बाड़ों में कीचड़, जलजमाव और नमी के कारण बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं, जिसकी वजह से यह रोग जन्म लेता है हवा और रोशनी की कमी वाले तंग बाड़ों में संक्रमण का खतरा अधिक होता है. दूध निकालने के बाद थन के सुराख लगभग 30-40 मिनट तक खुले रहते हैं. यदि पशु तुरंत गंदी जगह पर बैठ जाता है, तो जमीन पर मौजूद बैक्टीरिया थन के रास्ते शरीर में प्रवेश कर जाते हैं.
थनैला रोग के उपचार से बेहतर है इसका बचाव. पशुशाला का सही प्रबंधन ही इस बीमारी से बचने का सबसे कारगर उपाय है. पशुशाला को हमेशा साफ, सूखा और हवादार रखें. फर्श पर चूने का छिड़काव करें ताकि नमी और बैक्टीरिया समाप्त हो सकें. दूध निकालने के तुरंत बाद पशु को 40 मिनट तक बैठने न दें. इसके लिए दूध दुहने के तुरंत बाद पशु के आगे हरा चारा या दाना डाल दें, ताकि वह खड़ा होकर खाता रहे और इस दौरान थन के सुराख प्राकृतिक रूप से बंद हो जाएं.