‘तनी ऐहू पर ध्यान दी ऐ योगी बाबा’ संस्कृत कॉलेज की दुर्दशा पर इतिहासकार ने की

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‘तनी ऐहू पर ध्यान दी ऐ योगी बाबा’ संस्कृत कॉलेज की दुर्दशा पर इतिहासकार ने की


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बलिया का ऐतिहासिक जुबली संस्कृत कॉलेज, जो कभी विद्वानों का केंद्र रहा, आज जर्जर हालत में है. 1887 में स्थापित यह संस्थान पुनरुद्धार की राह देख रहा है. शिक्षा प्रेमियों और सरकार से इसके संरक्षण की अपील की जा रही…और पढ़ें

हाइलाइट्स

  • जुबली संस्कृत कॉलेज बलिया की हालत जर्जर है.
  • 1887 में स्थापित कॉलेज पुनरुद्धार की राह देख रहा है.
  • सरकार से कॉलेज के संरक्षण की अपील की जा रही है.

बलिया- बलिया जिले का जुबली संस्कृत कॉलेज न केवल शिक्षा का एक केंद्र रहा है, बल्कि यह उस दौर की याद दिलाता है जब विद्वानों, व्याकरणाचार्यों और साहित्याचार्यों की एक पीढ़ी ने यहां से शिक्षा प्राप्त की थी. बाबा बालेश्वर नाथ मंदिर के पश्चिम छोर पर स्थित यह कॉलेज आज विकास की राह ताक रहा है. इसकी स्थापना सन् 1887 में महारानी विक्टोरिया के जुबली वर्ष के उपलक्ष्य में हुई थी, जब बलिया के पंडित जगदेव उपाध्याय ने महारानी से इस विद्यालय की स्थापना की मांग रखी थी.

गुरुकुल से लेकर व्याकरणाचार्य की मान्यता
इस कॉलेज की शुरुआत एक छोटे से गुरुकुलम के रूप में हुई थी. धीरे-धीरे यह कॉलेज व्याकरणाचार्य (1932) और साहित्याचार्य (1952) की मान्यता प्राप्त कर एक प्रतिष्ठित संस्थान बना. पंडित श्याम सुंदर उपाध्याय, जो जिला परिषद के सचिव भी रहे, उन्होंने इसके विकास में अहम भूमिका निभाई. इसके पूर्व छात्रों में पं. जगन्नाथ शास्त्री और ज्योतिषाचार्य पं. रघुनाथ शर्मा जैसे विद्वान शामिल हैं.

वर्तमान में हालत जर्जर
आज यह ऐतिहासिक संस्थान खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. कॉलेज का भवन जर्जर हो चुका है और बरसात में कमरों की छतों से पानी टपकता है. कभी सैकड़ों छात्र-छात्राओं से गुलजार रहने वाला यह कॉलेज अब केवल 200 विद्यार्थियों तक सिमट गया है. फिर भी शिक्षण कार्य जैसे-तैसे जारी है.

संस्कृत विद्या के पुनर्जागरण की संभावनाएं
प्रभारी प्राचार्य सिद्धार्थ शंकर ओझा और आचार्य पीयूष उपाध्याय ने कॉलेज के पुनर्निर्माण की जरूरत पर जोर देते हुए बताया कि यदि सरकार विशेष ध्यान दे, तो यह संस्थान फिर से विद्वानों की एक नई पीढ़ी तैयार कर सकता है. बलिया जिले के चार अन्य संस्कृत विद्यालय भी जर्जर स्थिति में हैं, जो बंद होने की कगार पर हैं. ऐसे में जुबली कॉलेज को मॉडल बनाकर संस्कृत शिक्षा को फिर से नया जीवन दिया जा सकता है.

इतिहासकारों की चेतावनी और उम्मीद
वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय मानते हैं कि यदि सरकार इस कॉलेज के विकास को गंभीरता से ले, तो यह बलिया के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी. वेद, पुराण और कर्मकांड की परंपराएं फिर से जीवित हो सकती हैं, जिससे राष्ट्रहित में बड़ा योगदान होगा.

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