CM योगी के बयान से फिर चर्चा में आया 2003 का हनुमानगढ़ी रोजा इफ्तार
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Ayodhya News: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अयोध्या दौरे के दौरान दिए गए एक बयान के बाद करीब दो दशक पुरानी घटना फिर चर्चा में आ गई. योगी ने कहा कि पहले हनुमानगढ़ी में कुछ लोग रोजा इफ्तार करवाते थे. उनके इस बयान के बाद साल 2003 में आयोजित उस रोजा इफ्तार कार्यक्रम को लेकर फिर बहस शुरू हो गई है, जिसे उस समय सांप्रदायिक सौहार्द और हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल बताया गया था. आखिर वह आयोजन कब, क्यों और किन परिस्थितियों में हुआ था, आइए जानते हैं पूरी कहानी.
अयोध्या: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज अयोध्या दौरे पर थे उस दौरान उन्होंने एक बड़ा बयान सिद्ध पीठ हनुमानगढ़ी को लेकर दिया. जिसमें उन्होंने कहा कि हनुमानगढ़ी में कुछ लोग पहले रोजा इफ्तार करवाते थे. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस बयान के बाद एक बार फिर साल 2003 की घटना अयोध्या में चर्चा का विषय बन गई है. तो चलिए इस रिपोर्ट में विस्तार से समझते हैं.
दरअसल वर्ष 2003 में अयोध्या में सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी भाईचारे का संदेश देने के उद्देश्य से आयोजित एक रोजा इफ्तार कार्यक्रम काफी चर्चा में रहा था. उस समय हनुमानगढ़ी के वरिष्ठ महंत और तत्कालीन अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत ज्ञान दास ने अपने आवास पर रोजा इफ्तार का आयोजन कराया था. यह आयोजन उस दौर में हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल के रूप में देखा गया था.
बताया जाता है कि शुरुआत में हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर रोजा इफ्तार कराने की योजना थी.लेकिन स्थानीय संत-महंतों के विरोध के बाद तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) ने वहां आयोजन की अनुमति नहीं दी. इसके बाद महंत ज्ञान दास ने अपने आवास पर ही रोजा इफ्तार का आयोजन कराया.
इस कार्यक्रम में बाबरी मस्जिद मामले के प्रमुख पक्षकार रहे हाशिम अंसारी भी शामिल हुए थे. उनके साथ सादिक अली और बाबू ट्रेलर सहित कई अन्य लोग भी रोजा इफ्तार में मौजूद रहे. उस समय यह आयोजन सामाजिक और धार्मिक सद्भाव का संदेश देने वाले कार्यक्रम के रूप में चर्चा का विषय बना था.
वरिष्ठ पत्रकार आनंद गुप्ता के अनुसार महंत ज्ञान दास के आवास पर आयोजित इस रोजा इफ्तार में विभिन्न समुदायों के लोगों ने भाग लिया था. कार्यक्रम का उद्देश्य धार्मिक सौहार्द, आपसी विश्वास और सामाजिक एकता को मजबूत करना था. अयोध्या लंबे समय से धार्मिक आस्था का केंद्र होने के साथ-साथ सामाजिक समरसता के कई उदाहरणों की भी साक्षी रही है.
वर्ष 2003 का यह रोजा इफ्तार कार्यक्रम भी उन्हीं घटनाओं में शामिल माना जाता है, जिसमें अलग-अलग धर्मों के लोगों ने एक साथ बैठकर भाईचारे और सद्भाव का संदेश दिया था.आज भी इस आयोजन का उल्लेख अयोध्या में हिंदू-मुस्लिम एकता और सामाजिक सौहार्द की मिसाल के रूप में किया जाता है.उस समय हुए इस कार्यक्रम ने यह संदेश देने का प्रयास किया था कि आपसी संवाद, सम्मान और भाईचारा किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत होते हैं.
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अभिजीत चौहान, News18 Hindi के डिजिटल विंग में सब-एडिटर हैं. वर्तमान में अभिजीत उत्तर प्रदेश की राजनीति, सामाजिक मुद्दों, क्राइम, ब्रेकिंग न्यूज और वायरल ख़बरें कवरेज कर रहे हैं. AAFT कॉलेज से पत्रकारिता की मास्…और पढ़ें