कभी नेताओं को चौंकाने वाली कारीगरी, आज दरवाजे लगाने को मजबूर! कन्नौज की खोती..

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कभी नेताओं को चौंकाने वाली कारीगरी, आज दरवाजे लगाने को मजबूर! कन्नौज की खोती..


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कन्नौज के कारीगर रामशंकर की लकड़ी पर नक्काशी की पारंपरिक कला अब गुमनामी की ओर बढ़ रही है. कभी इत्रदानों से पहचाने जाने वाले इस हुनर को अब दोबारा पहचान दिलाने की जरूरत है.

कन्नौज- कन्नौज, जिसे इत्र नगरी कहा जाता है, वहां की हवाओं में आज भी केवड़ा, गुलाब और चंदन की खुशबू घुली रहती है. लेकिन इसी शहर की एक गली हाजीगंज में कभी एक और खुशबू बसी थी, लकड़ी की खुशबू. यह सिर्फ किसी इमारत की लकड़ी नहीं, बल्कि एक ऐसी पारंपरिक कारीगरी की महक थी जो आज मिट्टी में समाती जा रही है.

हाजीगंज मोहल्ले के रहने वाले रामशंकर कभी कन्नौज की एक अनमोल धरोहर थे. शीशम की लकड़ी पर उन्होंने जो बारीक नक्काशी की, वह आज भी कई लोगों की स्मृति में जीवित है. मछली के आकार के इत्रदान, कछुए जैसी आकृतियाँ और कलात्मक डिब्बे उनके हाथों की पहचान हुआ करते थे. एक समय ऐसा भी था जब उत्तर भारत के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में उनके बनाए इत्रदानों की खूब चर्चा होती थी. यहां तक कि एक वरिष्ठ नेता ने उन्हें उनके हुनर के लिए सम्मानित भी किया था.

वक्त बदला, बाजार बदला और पीछे छूट गई कला
जैसे-जैसे बाजार में कृत्रिम (आर्टिफिशियल) इत्रदानी और सजावटी सामानों की भरमार हुई, वैसे-वैसे रामशंकर की पारंपरिक कारीगरी हाशिए पर चली गई. वह रामशंकर, जिनके बनाए इत्रदान कभी शोकेस की शान हुआ करते थे, आज दूसरों के घरों में खिड़की-दरवाजे लगाने का काम कर रहे हैं. बदलाव की इस तेज आंधी ने उनकी कला को भुला दिया.

एक सपना जो अधूरा रह गया
रामशंकर बताते हैं कि उन्होंने इस कला को करीब 40 साल तक अपने जीवन का केंद्र बनाए रखा. एक समय उन्हें कुछ सरकारी विभागों से सहायता मिली और उन्होंने एक ट्रेनिंग स्कूल की शुरुआत की. उनका सपना था कि अगली पीढ़ी को इस विरासत से जोड़ा जाए, लेकिन अचानक सरकारी मदद रुक गई. नतीजा ट्रेनिंग सेंटर बंद हो गया और उस उम्मीद की खिड़की पर भी ताला लग गया, जिससे कई बेरोजगार हाथों को हुनर मिल सकता था.

उम्मीद की एक आखिरी लौ
रामशंकर की आंखों में आज भी उम्मीद बाकी है. वे कहते हैं कि अगर मुझे दोबारा थोड़ी सी भी मदद मिल जाए, तो मैं इस कला को सिर्फ कन्नौज नहीं, बल्कि पूरे देश में फैलाने का प्रयास करूंगा. उनके शब्दों में वो जुनून साफ झलकता है, जो किसी भी लोककला को जीवित रखने के लिए जरूरी है.

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