जब केशिपुत्र में मिले थे गहरवाल वंश के सिक्के, जानें कन्नौज का सुल्तानपुर से क्या था नाता?
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Gaharwal Dynasty History Sultanpur: सुल्तानपुर की धरती इतिहास के ऐसे गहरे राज दबाए बैठी है, जो आज भी लोगों को हैरान कर देते हैं. इसी मिट्टी से कभी गढ़ा के पास गहरवाल वंश के दुर्लभ सिक्के मिले थे, जो कन्नौज के राजाओं और सुल्तानपुर के गहरे रिश्तों की गवाही देते हैं. ये सिक्के कभी कुड़वार की रानी भुवनेश्वरी देवी के पास सुरक्षित थे, लेकिन रानी की मृत्यु के बाद इन ऐतिहासिक सिक्कों का रहस्य और गहरा गया. आखिर सुल्तानपुर से गहरवाल वंश का क्या नाता था और महमूद गजनवी के हमले के बाद कैसे इस राजवंश ने यहां अपनी जड़ें जमाईं. आइए जानते हैं.
सुल्तानपुर: उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर जिला ऐतिहासिक और पुरातात्विक नजरिए से बेहद खास माना जाता है. यहां कई ऐसे राजवंशों का प्रभाव रहा है जिन्होंने न केवल सुल्तानपुर बल्कि पूरे उत्तर भारत के इतिहास को गढ़ने में बड़ी भूमिका निभाई. मध्यकाल का प्रसिद्ध गहरवाल वंश भी इन्हीं में से एक है, जिसका सुल्तानपुर से सीधा और गहरा संबंध रहा है. इस बात का सबसे बड़ा सबूत यहां के ‘गढ़ा’ नामक स्थान से मिले वो प्राचीन सिक्के हैं, जो गहरवाल शासकों के दौर की याद दिलाते हैं.
सुल्तानपुर के वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह बताते हैं कि गहरवाल वंशी राजाओं के ये सिक्के कुड़वार के पास स्थित ‘गढ़ा’ (जिसे केशिपुत्र भी कहा जाता है) में मिले थे. ये ऐतिहासिक धरोहर कुड़वार की रानी भुवनेश्वरी देवी के पास वर्षों तक सुरक्षित रखी हुई थी. इन सिक्कों का महत्व इतना अधिक था कि प्रसिद्ध विद्वान आचार्य धर्मरक्षित ने भी इनका अध्ययन किया था. उन्होंने इन सिक्कों की तस्वीरें लेकर अपनी किताब “कलाम का गणतंत्र केशिपुत्र” में इनका बाकायदा जिक्र भी किया है. हालांकि, कई साल पहले लखनऊ में रानी भुवनेश्वरी देवी के निधन के बाद इन सिक्कों की वर्तमान स्थिति के बारे में पुख्ता जानकारी किसी के पास नहीं है.
गहरवाल वंश और सुल्तानपुर का रिश्ता
गहरवाल वंश का उदय कन्नौज में गुर्जर प्रतिहार सत्ता के पतन के बाद हुआ था. साल 1018 के आसपास जब महमूद गजनवी ने कन्नौज पर हमला कर तहस-नहस कर दिया, तब चंद्रदेव ने 11वीं सदी के अंत में गहरवाल वंश की नींव रखी. कहा जाता है कि उन्होंने काशी, कन्नौज और अयोध्या को अराजकता से मुक्त कराया था. चूंकि कन्नौज और सुल्तानपुर भौगोलिक रूप से एक-दूसरे के काफी नजदीक थे, इसलिए गहरवाल राजाओं का प्रभाव सुल्तानपुर तक फैलना स्वाभाविक था. इस वंश के अंतिम राजा जयचंद थे, जो 1194 में शहाबुद्दीन गोरी से हार गए थे. माना जाता है कि उस दौर में सुल्तानपुर के स्थानीय सामंतों ने गहरवाल राजाओं को भरपूर सहयोग दिया था.
सुल्तानपुर का भौगोलिक और ऐतिहासिक महत्व
इतिहासकारों का मानना है कि कन्नौज के निकट होने के कारण सुल्तानपुर का क्षेत्र गहरवाल शासकों के लिए सामरिक और राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण था. यहां मिले प्राचीन अवशेष और सिक्के इस बात की पुष्टि करते हैं कि शुरुआती मध्यकाल में यह क्षेत्र सत्ता का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था. सुल्तानपुर और आसपास के इलाकों में दबे ये अवशेष आज भी शोध का विषय हैं. जानकारों का कहना है कि अगर इन पुरातात्विक धरोहरों पर गहराई से रिसर्च की जाए, तो सुल्तानपुर के इतिहास के कई ऐसे पन्ने खुल सकते हैं जो अब तक दुनिया की नजरों से ओझल हैं.
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सीमा नाथ 6 साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शाह टाइम्स में रिपोर्टिंग के साथ की जिसके बाद कुछ समय उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम …और पढ़ें