जहां आज भी गूंजती है महाभारत की कहानी, जानिए यूपी के इस गांव का रहस्य!

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जहां आज भी गूंजती है महाभारत की कहानी, जानिए यूपी के इस गांव का रहस्य!


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Rampur News: रामपुर जिले के शाहाबाद तहसील का भूड़ा गांव महाभारत काल से जुड़ा है. यहां स्थित स्वर्गाश्रम में बाबा गुरु वाला सिद्ध ने साधना की थी. भूरिश्रवा की कहानी और संतों की तपस्थली है.

हाइलाइट्स

  • भूड़ा स्वर्गाश्रम का महाभारत से नाता है.
  • भूरिश्रवा और त्रिशूल तपोभूमि की कहानी प्रसिद्ध है.
  • अमेरिका से भी श्रद्धालु यहां आते हैं.
रामपुर: क्या आपने कभी ऐसी जगह के बारे में सुना है जहां मिट्टी में आज भी महाभारत के युद्ध की गूंज महसूस होती हो. रामपुर जिले की तहसील शाहाबाद का एक छोटा सा गांव भूड़ा, ऐसा ही रहस्यमयी स्थान है. यहां आस्था, इतिहास और अनोखी कहानियां एक साथ सुनने को मिलती हैं. भूड़ा गांव में स्थित स्वर्गाश्रम सिर्फ एक धार्मिक जगह नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी जीवित कहानी है जो सीधे महाभारत काल से जुड़ी हुई है.

पुजारी महिपाल बताते हैं कि भूड़ा स्वर्गाश्रम की नींव उस समय रखी गई थी जब महाभारत का युद्ध भी नहीं हुआ था. मान्यता है कि उस समय बाबा गुरु वाला सिद्ध नाम के एक तपस्वी इस स्थान पर आए थे. उन्होंने यहां त्रिशूल गाड़कर इसे अपनी साधना की भूमि बना लिया था. उस समय यह पूरा इलाका घने जंगलों से भरा हुआ था जहां जंगली जानवर घूमते थे. इस स्थान के बगल से गंगा बहती थी. लेकिन बाबा की साधना और सिद्धियों के कारण इस जगह को एक अलौकिक शक्ति मिल गई.

भूरिश्रवा और भूरी हथिनी की कहानी
यहां की सबसे चर्चित कहानी भूरिश्रवा नाम के योद्धा की है जो सैफनी राज्य का राजा था. वह बाबा गुरु वाला सिद्ध का परम भक्त था. मान्यता है कि भगवान शिव उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे एक खास वरदान में भूरी रंग की एक हथिनी दी थी. इसी कारण उसका नाम भूरिश्रवा पड़ गया.

भूरिश्रवा ने महाभारत युद्ध में कौरवों का साथ दिया था. जब तक वह युद्ध में जाने से पहले बाबा से आशीर्वाद लेता रहा, वह अपराजेय बना रहा. उसकी बहादुरी से पांडवों को काफी नुकसान उठाना पड़ा. जब पांडवों को यह पता चला कि उसकी शक्ति का रहस्य भूरी हथिनी और बाबा के आशीर्वाद में छिपा है, तो उन्होंने एक योजना बनाई. एक दिन भीम ने उस हथिनी को मार डाला ताकि भूरिश्रवा बाबा से मिलने न जा सके. हथिनी की मृत्यु के बाद वह स्वर्गाश्रम नहीं आ पाया और अगले ही दिन युद्ध में सात्यिकी से लड़ते हुए अर्जुन ने उसके दोनों हाथ काट दिए जिससे उसकी मृत्यु हो गई. ऐसा कहा जाता है कि अगर उस दिन भूरिश्रवा बाबा का आशीर्वाद ले पाता तो अर्जुन भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाता.

संतों की साधना स्थली रहा है स्वर्गाश्रम
भूड़ा स्वर्गाश्रम सिर्फ भूरिश्रवा और बाबा गुरु वाला सिद्ध की कहानी का गवाह नहीं रहा है, बल्कि यह स्थान कई संतों की तपस्थली भी रहा है. यहां बाबा जीवनदास, तुलसीदास और बालकदास जैसे संतों ने भी वर्षों तक साधना की थी. 16 नवंबर 2002 को ब्रह्मलीन हुए कबीरपंथी गुरु हरिदास ने भी यहां लगभग दो दशक तक लोगों को अध्यात्म का मार्ग दिखाया.

अमेरिका से भी आते हैं श्रद्धालु
आज भी इस स्थान की महिमा इतनी है कि यहां अमेरिका जैसे देशों से भी श्रद्धालु आते हैं. उन्हें यहां न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि इतिहास के उस अध्याय की झलक भी देखने को मिलती है जिसे न किताबों में पढ़ा जा सकता है और न ही किसी संग्रहालय में देखा जा सकता है. यह स्थान लोककथाओं में जिया गया इतिहास है.

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