पलाश के पत्तों का खत्म होता दौर प्लास्टिक ने छीना पाठा के आदिवासियों का रोजगार, जाने

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पलाश के पत्तों का खत्म होता दौर प्लास्टिक ने छीना पाठा के आदिवासियों का रोजगार, जाने


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चित्रकूट के पाठा क्षेत्र में कभी जंगलों से मिलने वाला पलाश का पत्ता लोगों की जिंदगी का सहारा हुआ करता था. यह सिर्फ एक पेड़ का पत्ता नहीं, बल्कि सैकड़ों आदिवासी परिवारों की रोजी-रोटी का जरिया था, लेकिन अब बदलते दौर और प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल ने इस परंपरागत रोजगार को लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंचा दिया है. जिससे उनके सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है.

चित्रकूटः धर्मनगरी चित्रकूट के पाठा क्षेत्र में कभी जंगलों से मिलने वाला पलाश का पत्ता लोगों की जिंदगी का सहारा हुआ करता था. यह सिर्फ एक पेड़ का पत्ता नहीं, बल्कि सैकड़ों आदिवासी परिवारों की रोजी-रोटी का जरिया था, लेकिन अब बदलते दौर और प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल ने इस परंपरागत रोजगार को लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंचा दिया है. जिससे उनके सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है.

घर चलाना अब हो रहा मुश्किल

जानकारी के लिए बता दे कि कुछ साल पहले तक पाठा के गांवों में सुबह होते ही महिलाएं और पुरुष जंगलों की ओर निकल जाते थे.वहां से पलाश के पत्ते तोड़कर लाए जाते थे और घरों में बैठकर पूरा परिवार दोना-पत्तल बनाने में लग जाता था. जिसमें बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक अपनी भूमिका निभाते थे. तैयार दोना-पत्तल स्थानीय बाजारों में बिकते और इसी से घर का खर्च चलता था.लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. बाजारों में प्लास्टिक और थर्माकोल के सस्ते बर्तनों ने जगह बना ली है, शादी-ब्याह हो या छोटे कार्यक्रम, लोग अब प्राकृतिक पत्तल की बजाय सस्ते और आसान विकल्प चुन रहे हैं.

प्लास्टिक पत्तलों ने खत्म किया रोजगार

पाठा क्षेत्र के रहने वाले पत्तल बनाने वाले कारीगर अनु खान ने लोकल 18 को जानकारी में बताया कि पहले वह रोजाना 500 से 1000 रुपए तक कमा लेते थे. लेकिन अब स्थिति यह है कि काम लगभग ठप हो चुका है, पहले लोग हमारे घर तक पत्तल लेने आते थे, अब मुश्किल से कुछ ही ग्राहक बचे हैं.जो इनको लेते है. उन्होंने बताया कि बड़े पत्तल की कीमत करीब 70 रुपए सैकड़ा और छोटी कटोरी 20-25 रुपए सैकड़ा मिलती है, लेकिन मांग लगातार गिरती जा रही है.उनका कहना है कि जंगलों में आज भी पलाश के पेड़ भरपूर मात्रा में मौजूद हैं, लेकिन उनके पत्तों की कोई पूछ नहीं रह गई है.स्थानीय दुकानदार भी अब प्लास्टिक की कटोरियों  को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि वह सस्ते और आसानी से उपलब्ध होते हैं.

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Rajneesh Kumar Yadav

मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें



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