यूपी के युवाओं के ‘खून में दौड़ेगा राष्ट्रवाद’, राहुल-अखिलेश के होश उड़ाने वाला प्लान

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यूपी के युवाओं के ‘खून में दौड़ेगा राष्ट्रवाद’, राहुल-अखिलेश के होश उड़ाने वाला प्लान


लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां धीरे-धीरे धार पकड़ने लगी है. समाजवादी पार्टी जहां पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ अयोध्या के राम मंदिर में चंदा चोरी के मुद्दे के भरोसे को लेकर आगे बढ़ते दिख रही है. वहीं कांग्रेस इन मुद्दों के साथ पेपर लीक के मसले को हवा देने में जुटी है. इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी दलित सुरक्षा के साथ ब्राह्मणों को सत्ता में उचित हिस्सेदारी को मुद्दा बना रही है. चुनावी रणनीति बनाने को लेकर जैसे ही बात सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की आती है तो उनकी प्लानिंग तमाम विपक्षी पार्टियों के होश उड़ाने वाली है.

2027 नहीं, 2050 तक की प्लानिंग में जुटी बीजेपी

आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी हर चुनाव की तरह होने वाली प्लानिंग तो कर ही रही है, लेकिन उसके साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीजेपी को लेकर तय किए गए विजन के लक्ष्य की ओर भी अग्रसर है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से 2047 में देश की आजादी की सौवीं वर्षगांठ पर विकसित भारत का सपना पूरा होने का लक्ष्य निर्धारित किया है. इसी का ध्यान रखते हुए बीजेपी किसी भी सूरत में खुद को सत्ता में बनाए रखना चाह रही है. बीजेपी बखूबी समझ चुकी है कि अगर उसे लंबे समय तक सत्ता में बने रहना है तो उसका केवल एक ही रास्ता है- ‘राष्ट्रवाद’. पार्टी के तमाम बड़े नेता इस बात का ख्याल रखकर रणनीति पर काम करते दिख रहे हैं.

इसी कड़ी में भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) को भी इसी ड्यूटी में लगाया गया है. भाजयुमो की ओर से नियुक्त हुए यूपी के नये प्रदेश अध्यक्ष प्रांशु दत्त द्विवेदी ने पद संभालते ही पहली बात कही है कि उनकी लड़ाई जाति के खिलाफ है. प्रांशु दत्त द्विवेदी ने कहा- ‘विपक्ष जातिवाद के जरिए समाज को बांटने की कोशिश करता रहा है, जबकि बीजेपी और उसका युवा मोर्चा राष्ट्रवाद के जरिए लोगों को जोड़ने का काम करेगा।’ उन्होंने कहा कि संगठन का मुख्य उद्देश्य युवाओं को राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया से जोड़ना और भाजपा की विचारधारा को गांव-गांव तक पहुंचाना है.

बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन की अगुवाई करते यूपी भाजयुमो प्रदेश अध्यक्ष प्रांशु दत्त द्विवेदी.

भाजयुमो के यूपी प्रदेश अध्यक्ष प्रांशु दत्त द्विवेदी की कही भावनाओं को समझें तो उन्हें यह जिम्मेदारी ही इसी शर्त पर सौंपी गई है कि वह प्रदेश के युवा वोटरों के मन से जातिवाद मिटाकर उन्हें राष्ट्रवाद के नाम पर एक मंच पर लाया जाए. इसके लिए उन्होंने गांव-गांव और कस्बे स्तर तक तमाम अभियान चलाने की बात कही है.

प्रांशु दत्त द्विवेदी

प्रांशु दत्त द्विवेदी के बयान में छुपा है बीजेपी का असली लक्ष्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरीखे बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व अपने भाषणों और क्रियाकलापों के जरिए राष्ट्रवाद का मैसेज तो देते ही हैं, लेकिन बीजेपी भविष्य की तैयारियों में भरोसा करती है. इसलिए माना जा रहा है कि भाजयुमो को इस ड्यूटी पर लगाया जाए. मकसद यह है कि जब एक बार कोई युवा वोटर जाति से उठकर राष्ट्रवाद के नाम पर बीजेपी से जुड़ता है तो यह लगभग तय माना जा रहा है कि अपने जीवन काल में वह शायद ही इस पार्टी से अलग हो पाए. इस अनुमान को इस आधार पर लगाया जा रहा है क्योंकि 2010 के दौर तक कांग्रेस के साथ भी यही होता देखा गया. जिन लोगों ने पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी का दौर देखा था उसमें से ज्यादातर लोग बुजुर्ग होने के बाद भी कांग्रेस को वोट देते रहे. लेकिन जब नई जेनरेशन के वोटर सामने आए तब बीजेपी का उत्थान दिखने लगा, जो निरंतर जारी है. प्रांशु दत्त द्विवेदी जैसे युवा नेताओं को यह निरंतरता बनाए रखने की ड्यूटी पर लगाई गई है.

धर्म की काट है जाति और सबका काट राष्ट्रवाद

भारतीय राजनीति में अक्सर देखा गया है जब-जब धर्म की राजनीति उफान मारती है तब-तब उसे काटने के लिए जाति को आगे किया जाता रहा है. गौर करने वाली बात यह है कि राष्ट्रवाद एक ऐसा मुद्दा है जिसमें धर्म और जाति दोनों को काबू करने की क्षमता नजर आती है. इस बात को कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है. 1990 में जब अयोध्या में राम मंदिर बनाने के नाम पर रथ यात्रा पर निकले तो आजाद देश में पहली बार कमंडल यानी धर्म आधारित राजनीति का शोर मचा. ऐसे समय में धर्म की राजनीति को रोकने के लिए वीपी मंडल, चंद्रशेखर, एचडी देवेगौड़ा, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव जैसे समाजवादी नेताओं ने मंडल यानी जाति आधारित राजनीति का सहारा लिया और अपने मिशन में सफल भी हुए.

सबसे ताजा उदाहरण 2024 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला. बीजेपी ने पीएम नरेंद्र मोदी की अगुवाई में ‘अबकी बार 400 पार’ का नारा दिया. जवाब में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पीडीए की बात की. पीडीए पूरी तरह से लोगों को जाति के आधार पर बांटने की रणनीति है. इसमें समाज को पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की बात की गई है. चुनाव में बीजेपी के पास पीएम मोदी, सीएम योगी जैसे हिंदुत्व का बड़ा चेहरा थे, कई वर्षों की लड़ाई के बाद अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण हुआ था, इसके बावजूद सपा ने 37 सीटें जीतकर बीजेपी को 240 सीटों पर रोकने में अहम रोल निभाई. इससे पहले 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय सेना की तरफ पाकिस्तान के खिलाफ की गई कार्रवाई के बाद बीजेपी अकेले दम पर 303 सीटें जीत पाई.

2024 के लोकसभा चुनाव के रिजल्ट से सबक लेने के बाद बीजेपी धर्म से ज्यादा राष्ट्रवाद को तवज्जो देती दिख रही है. वह भली-भांति समझ चुकी है कि राष्ट्रवाद एक ऐसा शब्द है जिसके सामने जाति का मुद्दा कहीं नहीं टिक सकता है. यही वजह है कि बीजेपी अपनी छोटी और बड़ी गलतियों को भी राष्ट्र की बदनामी से जोड़ देती है. उदाहरण के लिए-

  • अगर देश में कोई भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल पूछता है तो यह नैरेटिव बनाया जाता है कि फलां इंसान राष्ट्रविरोधी है. वह देश की बदनामी करना चाहता है इसलिए पीएम या देश से सवाल पूछ रहा है.
  • हाल ही में अयोध्या में राम मंदिर में चंदा चोरी का मुद्दा उछला तो बीजेपी के तमाम नेता कहते दिख रहे हैं कि विपक्ष दुनिया में हिंदू और देश को बदनाम कर रहा है.
  • इसके अलावा महाराष्ट्र में नवनिर्मित पुल गिरने की घटना हो, या किसी प्रकार के घोटाले या अनियमितता के आरोप, हर मौके पर यही कहा जाता है कि इस तरह के आरोपों से देश की छवि खराब हो रही है.
  • चुनाव की तमाम रैलियों में बीजेपी के नेता दावा करते हैं कि दुनिया में भारत का डंका बज रहा है. पीएम मोदी के विदेश दौरों को सरकार अच्छे से सेलिब्रेट करती नजर आती है.

ऐसे कई उदाहरण हैं, जिससे समझा जा सकता है कि बीजेपी राष्ट्रवाद को ज्यादा तवज्जो दे रही है. भाजयुमो के जरिए देश की युवा पीढ़ी को बीजेपी का लॉयल वोटर बनाने का काम किया जा रहा है. वहीं विपक्षी पार्टियों अभी भी तात्कालिक और स्वत: लाभ पाने वाले मुद्दों और जाति आधारित राजनीति के इर्द-गिर्द काम करती नजर आ रही है. अखिलेश यादव पीडीए, तेजस्वी यादव मुस्लिम+यादव, राहुल गांधी भी दलित और ओबीसी की खूब बातें करने लगे हैं.



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