विश्वामित्र की तपोस्थली से श्रीराम तक…अनूठा है मेरठ के रामायण कालीन गगोल तीर्थ का इतिहास

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विश्वामित्र की तपोस्थली से श्रीराम तक…अनूठा है मेरठ के रामायण कालीन गगोल तीर्थ का इतिहास


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Gagol Trith Meerut: मेरठ सिर्फ क्रांति की धरती ही नहीं, बल्कि धार्मिक और पौराणिक महत्व के लिए भी देशभर में अपनी अलग पहचान रखता है. शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित गगोल तीर्थ आज भी रामायण काल से जुड़े रहस्यों और मान्यताओं के कारण श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. मान्यता है कि यह स्थान महर्षि विश्वामित्र की तपोस्थली रहा है और भगवान श्रीराम ने यहीं पहुंचकर राक्षसों का वध किया था. जानिए मेरठ के इस ऐतिहासिक तीर्थ से जुड़े पौराणिक रहस्य और आस्था की कहानी.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मेरठ सिर्फ क्रांति की धरती के रूप में ही नहीं, बल्कि धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए भी जाना जाता है. 10 मई 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत भी मेरठ से ही हुई थी. इसके अलावा मेरठ का संबंध महाभारत और रामायण काल से भी माना जाता है. यही वजह है कि यहां मौजूद धार्मिक स्थलों और उनसे जुड़ी मान्यताओं को जानने के लिए देशभर से लोग समय-समय पर मेरठ पहुंचते हैं.

मेरठ से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित गगोल तीर्थ इसी धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत की एक झलक दिखाता है. यहां भगवान श्रीराम के आगमन से जुड़ी कई मान्यताएं प्रचलित हैं. इन्हीं रहस्यों और धार्मिक महत्व को जानने के लिए लोकल 18 की टीम ने गगोल तीर्थ के महंत शिवदास महाराज से खास बातचीत की.

गगोल तीर्थ के महंत शिवदास महाराज के अनुसार, गगोल तीर्थ को महर्षि विश्वामित्र की तपोस्थली माना जाता है. इसका उल्लेख कई धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है. मान्यता है कि यहीं पर महर्षि विश्वामित्र सप्तर्षियों के साथ बैठकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना और यज्ञ किया करते थे. वहीं, मान्यताओं के अनुसार मेरठ क्षेत्र को रावण की पत्नी मंदोदरी के पिता मय दानव के राज्य क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता था.

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मान्यता है कि उस समय इस क्षेत्र में राक्षसों का आतंक था, जो ऋषि-मुनियों को परेशान करते थे और उनके यज्ञ पूरे नहीं होने देते थे. राक्षसों की इन हरकतों से परेशान होकर ऋषि-मुनियों ने महर्षि विश्वामित्र से अपनी समस्या बताई. इसके बाद महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के पास पहुंचे और भगवान श्रीराम को अपने साथ ले जाने का आग्रह किया.

महंत शिवदास महाराज बताते हैं कि इसके बाद भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी गगोल तीर्थ पहुंचे थे. मान्यता है कि यहां उन्होंने राक्षसों का वध कर इस क्षेत्र को उनके आतंक से मुक्त कराया. इसके बाद यहां दोबारा यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठान होने लगे. मान्यता यह भी है कि इसी दौरान लक्ष्मण जी को प्यास लगी थी. आसपास जल नहीं मिलने पर भगवान श्रीराम ने अपने बाण से यहां जल की उत्पत्ति की थी.

आज यही स्थान एक सरोवर के रूप में मौजूद है, जो श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है. छठ पर्व समेत कई धार्मिक अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं. लोगों की आस्था को देखते हुए शासन की ओर से भी यहां विकास कार्य कराए जा रहे हैं, ताकि इस क्षेत्र को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सके.

गगोल तीर्थ में भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी की प्रतिमाओं के साथ सप्तऋषियों की मूर्तियां भी स्थापित हैं. यहां यज्ञशाला में सप्तऋषियों को यज्ञ करते हुए दिखाया गया है. इसके अलावा मान्यता है कि सरोवर में स्नान करने से त्वचा संबंधी कई परेशानियों से राहत मिलती है.

इतना ही नहीं, यहां मोक्ष धाम के रूप में भी एक विशेष केंद्र विकसित किया गया है. यहां स्वास्तिक आकार में सैकड़ों शिवलिंग बनाए गए हैं और बीच में मुख्य शिवलिंग स्थापित है. मान्यता है कि यहां विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने वाले श्रद्धालुओं को मोक्ष की प्राप्ति होती है. यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग गगोल तीर्थ पहुंचकर पूजा और दर्शन करते हैं.

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