सुल्तानपुर में कौन थे अल्दे, मल्दे दो भाई? जिनके नाम पर पड़ा परगना का नाम, जाने इतिहास
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Sultanpur history: सुल्तानपुर के वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह लोकल 18 से बताते हैं कि भर राजवंश के लोग बहुत ही साहसी और पराक्रमी थे. वह अपने शासन सत्ता को चलाने के लिए किसी भी बाधाओं का सामना कर सकते थे. भरों की सत्ता सुल्तानपुर में राजपूतों के आने के बाद कमजोर होती गई. पश्चिम की तरफ से जब राजपूत जातियाँ यहाँ पर आईं तो उन्होंने भर शासकों के यहाँ नौकरी की और फिर से सत्ता पर कब्जा कर लिया. मुस्लिम बादशाहों ने भी भरों पर आक्रमण किये. इसौली के भर राजा को पराजित करने के लिए अलाउद्दीन खिलजी ने बैस राजपूतों को भेजा था.
सुल्तानपुर: ऐतिहासिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण जिला माना जाता है. यहां पर कई ऐतिहासिक घटनाएं हुई, जो हमेशा के लिए अमर कहानियों के रूप में आज लोगों के सामने आती हैं. एक ऐसे ही कहानी है दो भाइयों की जिसे अल्दे और मल्दे के नाम से जाना जाता है. यह दो भाई सुल्तानपुर आकर लगभग 1000 साल पहले बसे और इन्हीं के नाम पर परगनों का नाम पड़ गया.
आपको बता दो की सुल्तानपुर शहर मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर कादीपुर तहसील से दक्षिण में कुछ दूरी पर अल्देमऊ नगर बसाया. इसके बारे में कहा जाता है कि इसे भर अल्दे ने बसाया था और वहीं पर अपनी गढ़ी भी बनाई थी.
भर वंश के थे अल्दे और मल्दे
सुल्तानपुर के वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह लोकल 18 से बताते हैं कि भर राजवंश के लोग बहुत ही साहसी और पराक्रमी थे. वह अपने शासन सत्ता को चलाने के लिए किसी भी बाधाओं का सामना कर सकते थे. भरों की सत्ता सुल्तानपुर में राजपूतों के आने के बाद कमजोर होती गई. पश्चिम की तरफ से जब राजपूत जातियाँ यहाँ पर आईं तो उन्होंने भर शासकों के यहाँ नौकरी की और फिर से सत्ता पर कब्जा कर लिया. मुस्लिम बादशाहों ने भी भरों पर आक्रमण किये. इसौली के भर राजा को पराजित करने के लिए अलाउद्दीन खिलजी ने बैस राजपूतों को भेजा था. उन्होंने अपने काम को अंजाम दिया। बदले में बादशाह ने उन्हें बहादुरी का खिताब “भाले सुलतान” दिया जिस नाम से जिले के पश्चिमी भाग में एक राजपूत जाति आज भी विद्यमान है. भरों का इतिहास सुल्तानपुर ही नहीं बल्कि आसपास कई जिलों में गौरवशाली रहा है.
सुल्तानपुर इतिहास की झलक किताब में है इनका नाम
इतिहासकार राजेश्वर सिंह ने अपनी पुस्तक सुल्तानपुर इतिहास की झलक में लिखा है कि अल्दे और मल्दे नाम के दो भर भाई थे. जिसमें अल्दे ने अपने नाम पर गोमती नदी के उत्तर और कादीपुर तहसील मुख्यालय से दक्षिण में कुछ दूरी पर अल्देमऊ नगर बसाया. वहीं पर अपनी गढ़ी स्थापित की. उसी के नाम पर आज भी परगना अल्देमऊ कायम चला आ रहा है. कूड़े भर ने कूड़ेभार, ईश ने इसौली में अपने शासन का केन्द्र बनाया. भरों के नाम पर आज भी इस जिले में सरैंया भरथी (बरौसा परगना), भरखरे व भेरौरा (चांदा परगना), भरथुआ अल्देमऊ परगना में राजस्व ग्राम शामिल हैं. कटघर का भर राजा नन्द कुंवर था. इसी तरह धोपाप का भी शासक भर राजा हेल था. ये भर शासक शैव मतावलम्बी थे, इसलिए उन्हें भारशिव भी कहा गया. भरों को खत्म करने में राजपूत और मुस्लिम शासकों का अहम योगदान था.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें