अश्वत्थामा आकर करते जलाभिषेक, शिवलिंग बदलता रंग…ये कानपुर के सबसे पुराने शिव मंदिर
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Kanpur Shiva Temples : सावन के महीने में कानपुर के शिव मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है. आनंदेश्वर, जागेश्वर, सिद्धनाथ, भूतेश्वर, खेरेश्वर, पातालेश्वर और नोनेश्वर महादेव मंदिर अपनी अनूठी मान्यताओं के लिए जाने जाते हैं. गंगा किनारे परमट में स्थित बाबा आनंदेश्वर मंदिर को कानपुर का काशी भी कहा जाता है. भूतेश्वर महादेव मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण भूतों ने किया और रामायण काल में माता सीता ने लव-कुश के साथ यहां जलाभिषेक किया था. जागेश्वर महादेव मंदिर का शिवलिंग दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है. खेरेश्वर महादेव मंदिर के बारे में कहा जाता है कि अश्वत्थामा आज भी गुप्त रूप से यहां आकर तड़के भगवान शिव का पहला पूजन और जलाभिषेक करते हैं.
गंगा किनारे परमट में स्थित बाबा आनंदेश्वर मंदिर कानपुर का सबसे प्रसिद्ध और आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है. इसे कानपुर का काशी भी कहा जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहां स्थापित शिवलिंग स्वयंभू (प्राकृतिक रूप से प्रकट) है. कहा जाता है कि इस स्थान पर ‘आनंदी’ नाम की गाय रोज आकर अपना दूध अर्पित करती थी, जिसके बाद ग्रामीणों ने खुदाई करके इस शिवलिंग को खोजा और गाय के नाम पर ही मंदिर का नाम ‘आनंदेश्वर’ पड़ा.
कानपुर में भूतेश्वर महादेव नाम से दो प्रमुख स्थल प्रसिद्ध हैं, जिनमें कल्याणपुर (आवास विकास) स्थित बाबा श्री भूतेश्वर धाम अति लोकप्रिय है. इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि प्राचीन काल में इसका निर्माण भूतों (शिव गणों) द्वारा एक ही रात में किया गया था, जिसके कारण इसका नाम भूतेश्वर पड़ा. यह भी कहा जाता है कि रामायण काल में माता सीता ने लव और कुश के साथ यहां जलाभिषेक किया था. शिवराजपुर क्षेत्र में भी एक 800 वर्ष पुराना ऐतिहासिक भूतेश्वर मंदिर है.
नवाबगंज क्षेत्र में स्थित जागेश्वर महादेव मंदिर अपने अद्भुत और अलौकिक शिवलिंग के लिए पूरे शहर में जाना जाता है. मान्यता है कि यहां स्थापित शिवलिंग दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है—प्रातःकाल, दोपहर और संध्या आरती के समय इसके रंग में प्राकृतिक बदलाव देखने को मिलता है. शांत और आध्यात्मिक वातावरण में बसा यह मंदिर सदियों पुराना है. स्थानीय निवासियों और दूर-दराज से आने वाले भक्तों के बीच यह मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है.
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जाजमऊ में गंगा के उच्च टीले पर स्थित सिद्धनाथ महादेव मंदिर को कानपुर की ‘द्वितीय काशी’ के नाम से भी जाना जाता है. इस पौराणिक मंदिर का इतिहास राजा ययाति के काल से जुड़ा हुआ है. पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा ययाति की ओर से कराई गई खुदाई में यहां शिवलिंग प्राप्त हुआ था. सिद्धनाथ मंदिर अपने नाम के अनुरूप सिद्धियों को देने वाला माना जाता है. यहां से प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर एक अत्यंत भव्य और विशाल शिव बारात निकाली जाती है, जिसमें पूरा शहर शामिल होता है.
कानपुर के शिवराजपुर क्षेत्र में गंगा तट के समीप स्थित खेरेश्वर महादेव मंदिर महाभारत कालीन इतिहास से जुड़ा एक अत्यंत पवित्र शिवालय है. पौराणिक आख्यानों के अनुसार, यह स्थान गुरु द्रोणाचार्य की तपोभूमि रहा है और मंदिर की स्थापना उनके पुत्र अश्वत्थामा से जोड़ी जाती है. जनश्रुति है कि अमरता का वरदान प्राप्त अश्वत्थामा आज भी गुप्त रूप से यहां आकर तड़के (ब्राह्ममुहूर्त में) भगवान शिव का पहला पूजन और जलाभिषेक करते हैं.
दक्षिण कानपुर के यशोदा नगर (गंगापुर कॉलोनी) में स्थित बाबा श्री पातालेश्वर महादेव मंदिर क्षेत्रीय श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख स्तंभ है. पाताल लोक से संबंधित मान्यताओं और भूमिगत गहराई से प्रकट शिवलिंग के कारण इसे पातालेश्वर महादेव कहा जाता है. यह मंदिर यशोदा नगर, किदवई नगर और नौबस्ता क्षेत्र के निवासियों के लिए दैनिक पूजा और धार्मिक आयोजनों का बड़ा केंद्र है. श्रावण मास के सोमवार को यहां भव्य श्रृंगार, महाआरती और विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है, जहां हजारों की संख्या में लोग आते हैं.
कानपुर के चौबेपुर क्षेत्र के नोनहा नरसिंह गांव में नोन नदी के किनारे टीले पर स्थित नोनेश्वर महादेव मंदिर लगभग 1400 वर्ष पुराना माना जाता है. इस प्राचीन मंदिर की स्थापना राजा रुकमंगत सिंह ने कराई थी. इस मंदिर का ऐतिहासिक महत्व इस बात से भी है कि मुगल काल में नूरबाकी की गोलियों के निशान आज भी यहां के शिवलिंग और दीवारों पर प्रत्यक्ष रूप से देखे जा सकते हैं. मंदिर परिसर के पास से एक गुप्त गुफा का रास्ता भी है, जो पास के प्राचीन काली मंदिर तक जाता था.