आगरा के पागलखाने के वो 8 अनसुने इतिहास, जो बेहद कम ही लोग जानते हैं
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Agra Mental Health Institute History: आगरा के मानसिक स्वास्थ्य संस्थान, जिसे कभी ‘पागलखाना’ कहा जाता था, का 1859 से अब तक का पूरा इतिहास और अनसुने किस्से देखें। यह संस्थान कैसे विकसित हुआ और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में क्या बदलाव आए, जानिए।
आज हम आपको आगरा के मानसिक स्वास्थ्य संस्थान जिसे कभी आगरा का पागलखाना भी कहा जाता था, उसका पूरा इतिहास और किस्से कहानी बताएंगे. दरअसल इतिहासकार अनुराग पालीवाल ने बताया कि इस मानसिक अस्पताल की स्थापना सितंबर 1859 में हुई थी. उस समय मानसिक बीमारी को आज की तरह चिकित्सकीय समस्या के बजाय अक्सर सामाजिक व्यवस्था और नियंत्रण से जोड़कर देखा जाता था. ब्रिटिश शासन में ऐसे संस्थान स्थापित किए जा रहे थे, जहां मानसिक रूप से बीमार लोगों को रखा जाता था. आगरा का संस्थान भी इसी व्यवस्था का हिस्सा था..
आगरा के इतिहासकार ने बताया कि इस अस्पताल की स्थापना से जुड़ी सबसे चर्चित ऐतिहासिक कहानी तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर जे.आर. कॉल्विन से जुड़ी है. उन्होंने कहा कि साल 1857 के दौरान कॉल्विन की मानसिक स्थिति खराब होने की बात सामने आई थी. इसी दौर की परिस्थितियों ने आगरा में मानसिक रोगियों के लिए संस्थान स्थापित करने की जरूरत को बढ़ाया. हालांकि इसे केवल एक व्यक्ति की बीमारी के कारण बना अस्पताल कहना पूरी तरह सही नहीं होगा, क्योंकि उस समय ब्रिटिश भारत में मानसिक आश्रमों की व्यवस्था तेजी से विकसित हो रही थी.
इतिहासकार अनुराग पालीवाल ने बताया कि आगरा के इस संस्थान में दर्ज पहले मरीज का नाम अनीगा बताया जाता है. उन्होंने कहा कि यह एक महिला भिखारी थीं, जिन्हें छावनी क्षेत्र में घूमते हुए पाए जाने के बाद 9 सितंबर सन 1859 को यहां भर्ती किया गया था. इतिहासकार ने कहा कि स्थापना के पहले ही वर्ष 39 मरीज भर्ती हुए. इनमें 25 की मौत हो गई, छह ठीक हुए, सात की हालत में सुधार हुआ और उन्हें छुट्टी के योग्य माना गया, जबकि एक मरीज के भाग जाने का भी रिकॉर्ड मिलता है.
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आगरा के वरिष्ठ इतिहासकार ने बताया कि इस संस्थान के शुरुआती दौर की तस्वीर आज के समय से बिल्कुल अलग थी. उन्होंने कहा कि उस समय मरीजों को मुख्य रूप से निगरानी और बंद व्यवस्था में रखा जाता था. कई हिस्सों में मिट्टी के बने मकानों का इस्तेमाल होता था और वार्डों की स्थिति बेहद खराब और अस्वच्छ बताई जाती थी. उन्होंने कहा कि उस दौर में दीवारों तक पर जुएं दिखाई देने और दस्त जैसी बीमारियों से मरीजों की मौत का उल्लेख किया जाता है. यह दौर मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था की कठिन शुरुआत को दिखाता है.
इतिहासकार अनुराग पालीवाल ने बताया कि शुरुआती समय में आगरा का यह संस्थान चिकित्सा व्यवस्था के बजाय प्रशासनिक और कस्टडील व्यवस्था से अधिक जुड़ा हुआ था. उन्होंने कहा कि इसका प्रबंधन इंस्पेक्टर जनरल ऑफ प्रिजन्स के अधीन था. बाद में व्यवस्था में बदलाव आया और सन 1905 में संस्थान का प्रशासन चिकित्सा अधीक्षक के नियंत्रण में आने लगा. यह परिवर्तन इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे मानसिक रोगियों को केवल बंद रखने के बजाय चिकित्सा देखभाल की दिशा में संस्थान के विकास की शुरुआत हुई.
उन्होंने बताया कि समय के साथ इस अस्पताल के कई नाम बदले गए. साल 1925 में आगरा लूनाटिक अस्येलूम का नाम बदलकर मेन्टल हॉस्पिटल आगरा कर दिया गया. यह नाम लंबे समय तक प्रचलित रहा और आम बोलचाल में लोग इसे आगरा का पागलखाना या मानसिक अस्पताल कहने लगे. हालांकि इतिहास में इस्तेमाल हुआ ‘लुनाटिक’ शब्द आज अप्रचलित और असंवेदनशील माना जाता है. उन्होंने कहा कि संस्थान का विकास धीरे-धीरे मानसिक रोगों के वैज्ञानिक उपचार, प्रशिक्षण और शोध की ओर बढ़ता गया.
साल 1994 में एक जनहित याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से इस संस्थान के स्वरूप में महत्वपूर्ण बदलाव आया. इसे आगरा मानसिक आरोग्यशाला के रूप में पुनर्गठित करने और मानसिक रोगियों के उपचार के साथ पुनर्वास, प्रशिक्षण और शोध को बढ़ावा देने के उद्देश्य तय किए गए. उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने 31 जनवरी, 1995 को इसे स्वायत्त संस्था घोषित किया. इसके बाद 8 फरवरी वर्ष 2001 को इसका नाम इंस्टिट्यूट ऑफ मेन्टल हेल्थ एंड हॉस्पिटल कर दिया गया.
आगरा के वरिष्ठ इतिहासकार और प्रोफेसर अनुराग पालीवाल ने बताया कि वर्तमान में 1859 वाला पुराना ‘पागलखाना’ केवल मरीजों को रखने की जगह नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य उपचार, शिक्षा, प्रशिक्षण और शोध का बड़ा संस्थान बन चुका है. करीब 172.8 एकड़ में फैला परिसर उत्तर भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के महत्वपूर्ण केंद्रों में गिना जाता है. साल 2009 में इसे राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत मनोचिकित्सा और संबद्ध विज्ञानों में मानव संसाधन के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के रूप में जाना गया.