करोड़ों नहीं, सिर्फ ₹47 लाख में बना था भारत का पहला डबल डेकर पुल…जिसकी मजबूती है मिसाल
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Malviya Bridge Varanasi: वाराणसी का ऐतिहासिक मालवीय ब्रिज सिर्फ गंगा पर बना एक पुल नहीं, बल्कि भारतीय इंजीनियरिंग और इतिहास की अहम धरोहर है. वर्ष 1887 में बना यह डबल डेकर पुल पश्चिम बंगाल के हावड़ा ब्रिज से भी काफी पुराना है और आज भी इस पर सड़क और रेल दोनों का संचालन होता है. 139 साल पुराना यह पुल अपनी मजबूत बनावट और ऐतिहासिक महत्व के कारण वाराणसी की पहचान बन चुका है.
वाराणसी में गंगा नदी पर बना मालवीय ब्रिज जिसे राजघाट पुल भी कहते है. देश के सबसे पुराने पुलों में गिना जाता है. यह पश्चिम बंगाल के हावड़ा ब्रिज से भी काफी पुराना है. हावड़ा ब्रिज का निर्माण 1936 में शुरू हुआ था और 1943 में उस पर वाहनों की आवाजाही शुरू हुई. वहीं वाराणसी का यह पुल वर्ष 1887 में बनकर तैयार हुआ था. यानी यह करीब 139 साल पुराना है और आज भी इस पर सड़क व रेल यातायात सुचारु रूप से चलता है.
इस पुल का निर्माण अंग्रेजों के शासनकाल में हुआ था. शुरुआत में इसका नाम डफरिन ब्रिज रखा गया था. आजादी के बाद इसका नाम बदलकर महान शिक्षाविद् पंडित मदन मोहन मालवीय के सम्मान में मालवीय ब्रिज कर दिया गया. यह एक डबल डेकर पुल है, जिसके ऊपरी हिस्से से सड़क यातायात और निचले हिस्से से रेलगाड़ियां गुजरती हैं.
मालवीय ब्रिज वाराणसी को चंदौली जिले से जोड़ता है. इसी मार्ग से सड़क और रेल दोनों के जरिए पूर्वी भारत, खासकर पश्चिम बंगाल की ओर आवाजाही होती है. आज यह पुल वाराणसी की पहचान बन चुका है. हर दिन हजारों लोग और कई ट्रेनें इस पुल से गुजरती हैं. इसकी कुल लंबाई करीब 1,048 मीटर है.
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वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु राज पांडेय बताते हैं कि यह भारतीय उपमहाद्वीप के शुरुआती डबल डेकर पुलों में से एक है, जहां एक ही ढांचे पर सड़क और रेलवे दोनों की व्यवस्था की गई थी. उन्होंने बताया कि अब इसके पास एक नया छह लेन डबल डेकर पुल भी बनाया जा रहा है, जिससे आने वाले समय में यातायात और आसान हो जाएगा.
अपनी मजबूत इंजीनियरिंग के कारण यह पुल आज भी मजबूती से खड़ा है. इसका निर्माण अवध और रोहिलखंड रेलवे के इंजीनियरों ने कराया था. जनवरी 1882 में इसका निर्माण शुरू हुआ और करीब पांच साल में यह बनकर तैयार हो गया. इस परियोजना की देखरेख इंजीनियर फ्रेडरिक वाल्टन ने की थी.
जानकारी के अनुसार, उस समय इस पुल के निर्माण पर करीब 47 लाख रुपये खर्च हुए थे, जो उस दौर में बहुत बड़ी राशि मानी जाती थी. पुल पर सड़क और रेल लाइन के साथ पैदल चलने वालों के लिए भी फुटपाथ बनाया गया था, जिसका आज भी लोग इस्तेमाल करते हैं. जब इस पुल से ट्रेन गुजरती है तो उसका नजारा देखने के लिए लोग आज भी रुक जाते हैं.
इंजीनियर फ्रेडरिक वाल्टन ने वाराणसी के इस पुल के अलावा गोदावरी नदी पर बने हैवलॉक ब्रिज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. वर्ष 1887 में पुल के उद्घाटन के दौरान उनके साथ प्रसिद्ध साहित्यकार रुडयार्ड किपलिंग भी मौजूद थे. उन्होंने इस पुल के निर्माण से जुड़ी कई बातें वाल्टन से विस्तार से जानी थीं.
पुल बनने के कुछ साल बाद रुडयार्ड किपलिंग ने अपनी प्रसिद्ध रचना द ब्रिज बिल्डर्स में ऐसे विशाल पुल के निर्माण की चुनौतियों का जिक्र किया. इसमें गंगा नदी की तेज धारा, बाढ़ और निर्माण के दौरान इंजीनियरों के सामने आई कठिनाइयों का भी वर्णन मिलता है. यही वजह थी कि इस परियोजना को पूरा करना आसान नहीं था. उस समय इस पुल के निर्माण की चर्चा देश ही नहीं, विदेशों तक हुई थी.