कीड़े-मकोड़े खाकर कीमती हो जाता है ये पक्षी, अफ्रीका का निवासी, किसानों का फेवरेट

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कीड़े-मकोड़े खाकर कीमती हो जाता है ये पक्षी, अफ्रीका का निवासी, किसानों का फेवरेट


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Farmers friend bird : इसे वेस्ट इंडीज, उत्तरी अमेरिका, कोलंबिया, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप में पाया जाता है. भारत में इस पक्षी को अनूठे नाम से पुकारा जाता है, जिसके बारे में आपने भी सुना होगा.

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किसान का मित्र है यह पक्षी खेतों से कीड़ों का कर देता है खात्मा

हाइलाइट्स

  • हेलमेटधारी गिनीफाउल अफ्रीका का मूल निवासी है.
  • ये पक्षी कीड़े-मकोड़े खाकर फसलों की रक्षा करता है.
  • विदेशों में इसे खेतों में दीमक खत्म करने के लिए पाला जाता है.

सहारनपुर. हेलमेटधारी गिनीफाउल एक ऐसा पक्षी है, जो न्यूमिडीडे परिवार से संबंधित है. ये गैलीफॉर्मेस क्रम में पाया जाता है. ये अफ्रीका का मूल निवासी है. खासकर सहारा के दक्षिण में इसे वेस्ट इंडीज, उत्तरी अमेरिका, कोलंबिया, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप में पाया जाता है. भारत में इस पक्षी को तीतर के नाम से पुकारा जाता है. ये पक्षी अपने मजबूत और चंचल स्वभाव के लिए जाना जाता है और इसे खेती के लिए उपयोगी माना गया है. ये कीड़ों को खाता है, जिससे फसलें सुरक्षित रहती हैं. हेलमेटेड गिनीफाउल के मांस का स्वाद मुर्गे के समान होता है और यह चिकन के मांस से अधिक सूखा होता है.

भारत में तीतर

इसके अंडे भी चिकन के अंडों की तुलना में अधिक पौष्टिक होते हैं. विदेश में इस पक्षी का लोग अपने खेतों में आने वाले कीड़ों को खत्म करने के लिए पालन करते हैं. ये पक्षी किसानों के लिए मित्र का काम करता है. खेतों में लगने वाली दीमक को ये पूरे तरह  खत्म कर देता है. सहारनपुर के प्राकृतिक कुंज से आचार्य राजेंद्र अटल लोकल 18 से कहते हैं कि उन्होंने कई प्रकार के पशु-पक्षियों को बचाया है. इन्हीं में से एक है हेलमेटधारी गिनीफाउल, जिसको भारत में तीतर कहा जाता है. राजेंद्र अटल का जन्म गंगोह के तीतरों में हुआ है और उन्होंने अपने बचपन में देखा था की बड़ी संख्या में लोग पशु पक्षियों को पाला करते थे. उनको जंगल में घुमाया करते थे. उन्हीं में से एक पक्षी तीतर भी था. ये यह जमीन के अंदर और जमीन पर रेंगने वाले कीड़े मकोड़ों को खा लिया करता था.

विदेशों में इन पक्षियों के बच्चों को खेतों में छोड़ दिया जाता है. वे सभी खेत में लगने वाली दीमक को देखते ही देखते चट कर जाते हैं. इससे बिना रासायनिक दवाइयां छिड़के ही इन कीड़ों का अंत हो जाता है. कीड़े-मकोड़े को खाकर ही ये पक्षी बड़े और कीमती हो जाते हैं. इसलिए इस पक्षी का पालन खेतों की रक्षा के लिए किया जाता है.

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