क्या मायावती-चंद्रशेखर-ओवैसी साथ आएंगे? यूपी चुनाव के पहले बिछने लगी बिसात
Last Updated:
Will Mayawati Chandrashekhar Azad and Owaisi Form An Alliance: उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले प्रदेश में कुछ बड़ा हो सकता है. ऐसा असदुद्दीन ओवैसी बयानों ने लगता है. राजनीतिक के जानकार एक और सवाल कर रहे हैं कि क्या ओवैसी की एआईएमआईएम मायावती की बसपा और चंद्रशेखर आजाद की पार्टी के साथ कोई गठबंधन भी कर सकती है क्या?
ओवैसी के ताजा बयान से ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या वह मायावती और चंद्रशेखर के साथ गठबंधन कर सकते हैं क्या?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अब चंद महीने दूर है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी जमीन मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है. इसी क्रम में एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का हालिया उत्तर प्रदेश दौरा और उनके बयान राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा को जन्म दे रहे हैं. खासकर उनका यह कहना कि अब दरी बिछाने की राजनीति नहीं होगी, हिस्सेदारी और बराबरी की लड़ाई होगी, इस बात का संकेत माना जा रहा है कि ओवैसी अब सिर्फ चुनावी मौजूदगी दर्ज कराने नहीं, बल्कि सत्ता की राजनीति में वास्तविक हिस्सेदारी हासिल करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.
बहराइच के मटेरा में आयोजित जनसभा में ओवैसी ने साफ कर दिया कि उनकी पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे को केंद्र में रखेगी. उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई भाजपा को रोकना चाहता है तो एआईएमआईएम सम्मानजनक साझेदारी के लिए तैयार है. यह बयान केवल एक राजनीतिक संदेश नहीं, बल्कि संभावित गठबंधन की दिशा में फेंका गया संकेत भी माना जा रहा है.
यही वजह है कि अब राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या उत्तर प्रदेश में दलित-मुस्लिम समीकरण को नया रूप देने की कोशिश शुरू हो चुकी है? क्या ओवैसी, बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती और आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद भविष्य में किसी साझा राजनीतिक मंच पर आ सकते हैं?
सामाजिक न्याय का सवाल
दरअसल, तीनों नेताओं की राजनीति का एक साझा बिंदु है- प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय का सवाल. मायावती लंबे समय से दलित राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा रही हैं. वहीं चंद्रशेखर आजाद युवा दलित मतदाताओं के बीच अपनी अलग पहचान बना चुके हैं. दूसरी ओर ओवैसी लगातार मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बड़ा मुद्दा बनाते रहे हैं. ऐसे में यदि सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के आधार पर देखा जाए तो इन तीनों के बीच संवाद की संभावनाओं से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता.
हालांकि रास्ता आसान नहीं है. मायावती अब तक किसी भी बड़े गठबंधन को लेकर बेहद सतर्क रही हैं. बसपा की रणनीति हमेशा स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखने की रही है. वहीं चंद्रशेखर आजाद भी खुद को केवल दलित नेता के रूप में सीमित नहीं रखना चाहते और व्यापक विपक्षी राजनीति में अपनी भूमिका तलाश रहे हैं. ओवैसी की मौजूदगी भी कई विपक्षी दलों के लिए असहजता का कारण बनती रही है, क्योंकि उन पर भाजपा को अप्रत्यक्ष फायदा पहुंचाने के आरोप लगते रहे हैं.
अपने भाषण में ओवैसी ने समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर भी तीखा हमला बोला. उन्होंने बंगाल की राजनीति का जिक्र करते हुए विपक्षी दलों की रणनीतियों पर सवाल उठाए. इससे यह संकेत भी मिलता है कि फिलहाल एआईएमआईएम की दूरी सपा से बनी हुई है और वह खुद को एक स्वतंत्र राजनीतिक धुरी के रूप में स्थापित करना चाहती है.
ओवैसी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार पर कानून व्यवस्था, बुलडोजर कार्रवाई और अल्पसंख्यकों के साथ कथित भेदभाव को लेकर हमला बोला. साथ ही अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी घेरा. ईरान-ओमान समुद्री क्षेत्र में भारतीय नागरिकों की मौत का मुद्दा उठाकर उन्होंने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर सवाल खड़े किए और मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश की.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा के खिलाफ विपक्षी वोटों के बिखराव को रोकने की चर्चा तेज हो रही है. यदि आने वाले महीनों में मायावती, चंद्रशेखर और ओवैसी के बीच किसी स्तर पर संवाद शुरू होता है तो यह राज्य की राजनीति में एक नया समीकरण पैदा कर सकता है.
About the Author

न्यूज18 हिंदी में बतौर एसोसिएट एडिटर कार्यरत. मीडिया में करीब दो दशक का अनुभव. दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आईएएनएस, बीबीसी, अमर उजाला, जी समूह सहित कई अन्य संस्थानों में कार्य करने का मौका मिला. माखनलाल यूनिवर्स…और पढ़ें