पांडुलिपि खोज: वाराणसी नंबर-1 पर, अयोध्या दूसरे स्थान पर चमका
Ayodhya Ancient Manuscripts: उत्तर प्रदेश के प्राचीन मठ और मंदिरों में सदियों से बंद कमरों और अलमारियों के भीतर ज्ञान का एक ऐसा अनमोल खजाना छिपा है, जिसकी हम और आप कल्पना भी नहीं कर सकते. केंद्र सरकार की देखरेख में पूरे राज्य में ‘ज्ञान भारतम मिशन’ के तहत एक बहुत बड़ा अभियान चल रहा है. इस अभियान का मकसद हमारे पूर्वजों द्वारा हाथ से लिखी गई दुर्लभ पांडुलिपियों को खोजना, उनका रजिस्ट्रेशन करना और उन्हें हमेशा के लिए सुरक्षित करना है. इस ऐतिहासिक खोज अभियान में धर्म नगरी वाराणसी (बनारस) पूरे प्रदेश में पहले नंबर पर चल रही है, जबकि रामनगरी अयोध्या दूसरे पायदान पर मजबूती से टिकी हुई है.
अयोध्या में खोजी गईं 1.44 लाख पांडुलिपियां, अभी 70% काम बाकी
अयोध्या के प्रोजेक्ट डायरेक्टर (पीडी) गिरीश पाठक ने बताया कि अयोध्या में करीब 10 हजार मंदिर और मठ हैं. इनमें से कई मंदिर तो बेहद प्राचीन और ऐतिहासिक हैं. इन जगहों पर सदियों पुराना ज्ञान दबा पड़ा है. अब तक की गई खोज में टीमों ने करीब 1 लाख 44 हजार दुर्लभ पांडुलिपियों को ढूंढ निकाला है और उनका डिजिटल पंजीकरण भी कर लिया गया है. चौंकाने वाली बात यह है कि यह तो सिर्फ शुरुआत है. प्रोजेक्ट डायरेक्टर के मुताबिक, अभी तक सिर्फ 30 फीसदी काम ही पूरा हो पाया है. अनुमान है कि अयोध्या के ग्रामीण इलाकों, पुराने मठों और पौराणिक स्थलों पर अभी भी बहुत बड़ी संख्या में दुर्लभ पांडुलिपियां मौजूद हैं, जिनकी तलाश के लिए बाकी बचे मंदिरों से संपर्क साधा जा रहा है.
जांच के बाद ही होता है रजिस्ट्रेशन
अयोध्या के प्रोजेक्ट डायरेक्टर (पीडी) गिरीश पाठक ने बताया कि ऐसा नहीं है कि हर पुरानी किताब या कागज को इस लिस्ट में शामिल किया जा रहा है. अभियान में लगी एक्सपर्ट्स की टीमें पहले यह जांचती हैं कि हस्तलिखित पांडुलिपि कितनी पुरानी है, उसका ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व क्या है, और उसकी प्रमाणिकता (वैधता) क्या है. पूरी परख के बाद ही उसे सरकारी सूची में जगह मिलती है.
250 कर्मचारियों की टीम और 20 बड़े संस्थानों का सर्वे
इस महाभियान को जमीन पर उतारने के लिए करीब 250 कर्मचारियों की एक बड़ी फौज दिन-रात काम कर रही है. अब तक अयोध्या के 20 बड़े प्रमुख संस्थानों और मठों का सर्वे पूरा किया जा चुका है. शहर के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों के प्राचीन मंदिरों को भी खंगाला जा रहा है. जिन प्रमुख जगहों पर सबसे बड़ा खजाना मिला है, उनमें अंतर्राष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय, श्री राम ग्रंथागार, संत पलटू दास का मंदिर और मणि राम छावनी जैसे नाम शामिल हैं.
जानिए किस मंदिर/संस्थान में मिलीं कितनी पांडुलिपियां
ज्ञान भारतम मिशन के तहत अयोध्या के प्रमुख केंद्रों पर जो रजिस्ट्रेशन हुआ है, उसका पूरा आंकड़ा इस प्रकार है.
| संस्थान/मंदिर का नाम | पंजीकृत पांडुलिपियों की संख्या |
| मणि राम छावनी | 45,000 |
| इंटरनेशनल राम कथा संग्रहालय | 18,000 |
| तपस्वी जी की स्थली | 15,000 |
| संत पलटू दास मंदिर | 9,150 |
| कालेराम मंदिर | 9,000 |
| विभीषण कुंड (छोटी देवकाली) | 8,100 |
| श्री राम ग्रंथागार | 7,030 |
| अचारी मंदिर | 5,000 |
| रामकोट | 1,105 |
| लक्ष्मण घाट | 200 |
श्री राम ग्रंथागार: 800 साल पुराने ज्ञान की बर्बादी की दर्दनाक दास्तान
इस पूरे अभियान में मणि पर्वत के पास स्थित ‘श्री राम ग्रंथागार’ प्राचीन साहित्य का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है. इस अकेले ग्रंथागार से 7 हजार से ज्यादा पांडुलिपियों को सहेजा जा चुका है. लेकिन इसके साथ ही एक परेशान करने वाली हकीकत भी सामने आई है. इस ग्रंथागार के 5 कमरों में 300 से लेकर 800 साल पुरानी हजारों दुर्लभ कृतियां, धार्मिक टीकाएं और साहित्य आज बुक फॉर्म (किताबों की शक्ल) में बेहद खराब हालत में पड़े-पड़े बर्बाद हो रहे हैं.
क्यों अधर में लटकी हैं ये दुर्लभ किताबें?
दरअसल, केंद्र सरकार की मौजूदा कार्ययोजना (गाइडलाइंस) के तहत केवल ‘हस्तलिखित पांडुलिपियों’ का ही रजिस्ट्रेशन और संरक्षण किया जा रहा है. ऐसे में जो दुर्लभ प्राचीन पुस्तकें प्रिंटेड या बुक फॉर्म में हैं, उन्हें इस योजना में शामिल नहीं किया गया है और वे भगवान भरोसे छोड़ दी गई हैं.
महंत राम कुमार दास की मेहनत पर फिर रहा पानी
इस अनमोल राम ग्रंथालय की स्थापना आज से करीब 96 साल पहले (1930 में) महंत राम कुमार दास ने की थी. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी देश-दुनिया से इन दुर्लभ पुस्तकों और प्राचीन पांडुलिपियों को इकट्ठा करने में लगा दी. जब तक वो जीवित रहे, उन्होंने इसे जान से ज्यादा संभालकर रखा. लेकिन उनके जाने के बाद उनके वारिस और शिष्य इस विशाल विरासत को संभाल नहीं सके. दिवंगत महंत का दावा था कि यहाँ हिंदी, संस्कृत और बांग्ला भाषा में लिखी गई 800 साल तक पुरानी पांडुलिपियां मौजूद हैं.
अलमारियों में सड़ रहा है वेदों और पुराणों का खजाना
ग्रंथागार के पुराने रिकॉर्ड और विवरण पर नजर डालें तो यहां ज्ञान का जो भंडार धूल फांक रहा है, वो किसी को भी हैरान कर सकता है. यहां खुले में और टूटी अलमारियों में जो किताबें नष्ट हो रही हैं, उनमें शामिल हैं:
वैदिक काल का साहित्य: 750 पुस्तकें
- दर्शनशास्त्र: 1370 पुस्तकें
- श्री राम साहित्य: 1050 पुस्तकें
- तुलसी साहित्य: 1329 पुस्तकें
- भक्त चरित्र: 650 पुस्तकें
- वेद और पुराण: 360 वेद और 200 पुराण
- कर्मकांड और कृष्ण साहित्य: 1300 कर्मकांड और 100 कृष्ण साहित्य की पुस्तकें
- अन्य: 300 महापुरुषों (हिस्ट्री हीरोज) की जीवनियां, 500 नाटक और अलग-अलग विषयों की 2 हजार से ज्यादा अनमोल किताबें.