बंटवारे के दर्द से बनी गाजियाबाद की पहचान ‘भगत सिंह गोल मार्केट’, जानिए कहानी

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बंटवारे के दर्द से बनी गाजियाबाद की पहचान ‘भगत सिंह गोल मार्केट’, जानिए कहानी


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Ghaziabad News: 15 अगस्त 1947 को देश आजादी के जश्न में डूबा था, लेकिन इसी तारीख के सीने में बंटवारे का वह गहरा जख्म भी दर्ज है जिसकी टीस आज भी कई परिवारों के दिलों में ताजा है. अपना घर-बार और जमा-पूंजी पाकिस्तान में छोड़कर गाजियाबाद पहुंचे शरणार्थियों ने जब अपनी जिंदगी को शून्य से शुरू किया, तो ‘रिफ्यूजी मार्केट’ उनकी नई उम्मीद बनी. आज वही बाजार ‘भगत सिंह गोल मार्केट’ के रूप में न केवल गाजियाबाद की ऐतिहासिक पहचान है, बल्कि यहां के दुकानों में बंटवारे के दर्द और संघर्ष की विरासत चौथी पीढ़ी तक जीवंत खड़ी है.

Ghaziabad News: 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ, लेकिन आजादी के साथ बंटवारे का ऐसा दर्द भी मिला जिसे लाखों परिवार आज तक नहीं भूल पाए हैं. पाकिस्तान से उजड़कर भारत आए लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि नए शहर में परिवार का पेट कैसे पाला जाए. गाजियाबाद पहुंचे ऐसे ही शरणार्थियों के लिए सिटी बोर्ड ने रिफ्यूजी मार्केट बनाई. आज यही बाजार ‘भगत सिंह गोल मार्केट’ के नाम से गाजियाबाद की पहचान बना हुआ है. उस समय यहां करीब 200 दुकानें बसाई गई थीं. आज इस बाजार में एक ऐसी ही दुकान की विरासत चौथी पीढ़ी संभाल रही है, हालांकि समय के साथ बंटवारे के बाद यहां दुकान लगाने वाले कई लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं.

जवाहर गेट से 200 दुकानों वाली रिफ्यूजी मार्केट तक
बंटवारे के समय बैजनाथ लाहौरिया लाहौर से अपना घर-बार छोड़कर भारत आए थे. परिवार का सामान, जमा पूंजी और पुरानी जिंदगी सब पाकिस्तान में छूट गई थी. दिल्ली होते हुए वह गाजियाबाद पहुंचे. उस समय रोजी-रोटी चलाना आसान नहीं था. उन्होंने घंटाघर के पास जवाहर गेट में छोटी सी दुकान लगाकर अपना जीवन शुरू किया. इसके बाद 1958 में सिटी बोर्ड ने पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के लिए रिफ्यूजी मार्केट बनाई. करीब 200 दुकानों वाली यह मार्केट उस समय कई परिवारों के लिए नए जीवन की शुरुआत बनी.

लाहौरिया परिवार: 4 पीढ़ियों तक पहुंची संघर्ष की विरासत
बैजनाथ लाहौरिया की दुकान की जिम्मेदारी पहले उनके बेटे ब्रजमोहन लाहौरिया ने संभाली. इसके बाद उनके बेटे संजीव लाहौरिया ने दुकान संभाली और अब संजीव अपने बेटे के साथ इस दुकान को चला रहे हैं. यानी बंटवारे के बाद शुरू हुई इस दुकान की विरासत आज चौथी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है.

किताबों से परे: घर में सुनी दास्तां और 15 अगस्त की यादें
संजीव लाहौरिया ने बताया कि उन्होंने अपने दादाजी को नहीं देखा, लेकिन पिता से बंटवारे और परिवार के संघर्ष की कई बातें सुनी हैं. उनका कहना है कि इतिहास उन्होंने किताबों में भी पढ़ा, लेकिन घर में सुने किस्से उन घटनाओं को उनके लिए और ज्यादा करीब ले आते हैं. 15 अगस्त आते ही परिवार में पुरानी यादें फिर ताजा हो जाती हैं. बंटवारे में उजड़े घर, अपनों से बिछड़ने और लोगों की मौत की बातें याद कर आज भी रूह कांप जाती है.

आधुनिक गाजियाबाद के बीच पुराने इतिहास की जीवंत गवाही
समय के साथ रिफ्यूजी मार्केट का नाम बदलकर ‘भगत सिंह गोल मार्केट’ हो गया. गाजियाबाद चार गेटों से निकलकर आज बड़े शहर में बदल चुका है. मेट्रो, एक्सप्रेसवे और बड़ी-बड़ी इंडस्ट्री इसकी पहचान बन चुकी हैं, लेकिन घंटाघर के पास मौजूद यह बाजार आज भी पुराने गाजियाबाद की कहानी सुनाता है. यहां बर्तन, चूड़ियां, साड़ी, सूट, कपड़े और रोजमर्रा की जरूरत का सामान उचित दामों पर मिलता है. खासकर महिलाओं के बीच यह बाजार आज भी काफी लोकप्रिय है. यह सिर्फ बाजार नहीं, बल्कि बंटवारे के दर्द के बीच नए भारत में शुरू हुई जिंदगी और मेहनत की जीवंत कहानी है.

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Rahul Goel

Rahul Goyal is a senior journalist with over 15 years of experience in print and digital media. He currently serves as a Coordinator and Publisher at News18 Hindi, managing State and Local18 content operations …

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