यूपी का वो CM जो जेब में रखता था इस्तीफा, उसूलों से कभी नहीं किया समझौता
Uttar Pradesh Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगर किसानों की बात होगी तो एक नाम सबसे पहले लिया जाएगा-चौधरी चरण सिंह. उन्हें सिर्फ मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि उस नेता के रूप में याद किया जाता है. जिसने गांव, खेत-किसान को राजनीति के केंद्र में ला दिया. यही वजह है कि आज भी उन्हें ‘किसानों का मसीहा’ कहा जाता है. यही नहीं जिस राजनीति में कुर्सी बचाने के लिए नेता क्या-क्या नहीं करते. कई बार अपनी ही बात से पीछे हट जाते हैं, कई बार समझौता कर लेते हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में यही मुख्यमंत्री ऐसे थे जिनकी पहचान बिल्कुल अलग थी. कहा जाता है कि वह हमेशा अपनी जेब में इस्तीफा लेकर चलते थे. अगर उन्हें लगता कि उनके सिद्धांतों से समझौता कराया जा रहा है, तो वह बिना देर किए इस्तीफा देने को तैयार हो जाते थे.
कौन थे चौधरी चरण सिंह?
चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को मेरठ जिले के नूरपुर गांव में एक किसान परिवार में हुआ. उन्होंने 1923 में साइंस से ग्रेजुएट की और 1925 में आगरा यूनिवर्सिटी से मास्टर की डिग्री ली. वकालत की पढ़ाई के बाद गाजियाबाद से अपने पेशे की शुरुआत की. 1929 में मेरठ आ गये और आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया और बाद में कांग्रेस से जुड़ गए. उत्तर प्रदेश की राजनीति में उन्होंने किसानों के अधिकार, जमीन सुधार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया. यही वजह रही कि उन्हें आगे चलकर ‘किसानों का मसीहा’ कहा जाने लगा. वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और बाद में देश के प्रधानमंत्री भी बने. लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान सत्ता नहीं, बल्कि उनके सिद्धांत माने जाते हैं.
चौधरी चरण सिंह के जेब में हमेशा रहता था इस्तीफा
चौधरी चरण सिंह के बारे में यह किस्सा सिर्फ राजनीतिक गलियारों में ही नहीं, बल्कि कई दस्तावेजों और किताबों में भी दर्ज है. चौधरी चरण सिंह आर्काइव में 17 फरवरी 1968 के घटनाक्रम का जिक्र करते हुए लिखा गया है कि “वे हमेशा अपना इस्तीफा अपने पास रखते थे और यदि उन्हें अपने नैतिक सिद्धांतों से समझौता करने के लिए कहा जाता, तो उसे देने में कभी हिचकिचाते नहीं थे.” यही वजह थी कि उनके सहयोगी भी जानते थे कि चरण सिंह किसी भी कीमत पर अपने उसूलों से पीछे नहीं हटेंगे.
सिर्फ किस्सा नहीं, किताबों में भी दर्ज है यह बात
चरण सिंह के करीबी रहे तिलक राम शर्मा ने अपनी किताब ‘My Days With Chaudhary Charan Singh’ में भी इस आदत का जिक्र किया है. किताब में चरण सिंह का कथन दर्ज है—”मैं हमेशा अपनी जेब में इस्तीफा लेकर चलता था.” यानी यह सिर्फ राजनीतिक चर्चा नहीं, बल्कि उनके साथ काम करने वाले लोगों के संस्मरणों में भी दर्ज है. वहीं, उनकी जीवनी ‘Crusader Against Injustice, Exploitation and Corruption’ में लिखा गया है कि 1946 के बाद उन्होंने नौ बार इस्तीफा दिया या इस्तीफा देने की पेशकश की. जब भी उन्हें लगा कि आत्मसम्मान, जनहित या सिद्धांतों से समझौता करना पड़ेगा, उन्होंने पद की परवाह नहीं की.
कांग्रेस में रहते हुए भी किसानों की आवाज उठाई
चौधरी चरण सिंह अपने नियम-कानून के कितने पक्के थे इस बात से भी समझा जा सकता है कि वह कांग्रेस में जरूर थे, लेकिन कई मुद्दों पर उनकी राय पार्टी नेतृत्व से अलग होती थी. उनका मानना था कि सरकार की नीतियों का सबसे बड़ा फायदा गांव और किसानों को मिलना चाहिए. उन्होंने उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन कानून लागू कराने में अहम भूमिका निभाई. इस फैसले ने लाखों किसानों को जमीन पर अधिकार दिलाने का रास्ता खोला और उनकी पहचान किसान नेता के रूप में मजबूत होती गई.
फिर कांग्रेस से क्यों अलग हुए?
1960 के दशक में कांग्रेस के भीतर मतभेद बढ़ने लगे. चरण सिंह को लगता था कि पार्टी किसानों की बजाय सत्ता की राजनीति में ज्यादा उलझ गई है. 1967 के विधानसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पहली बार कमजोर हुई. इसी दौर में चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़ दी और दूसरे दलों के साथ मिलकर संयुक्त विधायक दल (SVD) की सरकार बनाई. यहीं से उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हुआ.
पहली बार कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई
3 अप्रैल 1967 को चौधरी चरण सिंह ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. यह सिर्फ सरकार बदलने की घटना नहीं थी. आजादी के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और एक गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. राजनीतिक विश्लेषक इसे उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा टर्निंग पॉइंट मानते हैं. यही वह दौर था, जब गठबंधन राजनीति की शुरुआत भी मजबूत रूप में दिखाई देने लगी.
आज भी क्यों याद किया जाता है यह किस्सा?
चौधरी चरण सिंह की सबसे बड़ी पहचान सिर्फ मुख्यमंत्री बनने की नहीं है. उनके नैतिक स्वभाव उनका किसानों के प्रति प्रेम और कांग्रेस को पहली बार सत्ता से बाहर करने के लिए पूरे जीवन याद किया जाएगा. क्योंकि उनके सीएम बनने के बाद ही राज्य की राजनीति पूरी तरह बदल गई और गठबंधन राजनीति का दौर शुरू हुआ.