राहुल, केजरीवाल, ममता और लालू ने तो हद ही कर दी, जानिए पूरी बात
कांग्रेस की लीडरशिप वाले इंडिया ब्लाक की पार्टियों को संविधान खतरे में दिखता है. संविधान बचाने की रक्षा का राग विपक्षी पार्टियां अकक्सर अलापती हैं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी तो संविधान की लाल किताब साथ लेकर घूमते हैं. केंद्र सरकार पर विपक्ष को संदेह है. केंद्रीय एजेंसियों की विष्पक्षता पर विपक्षी शक करते हैं. यहां तक कि अदालतों और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी विपक्ष को शक है. लालू यादव और अरविंद केजरीवाल को जजों पर भरोसा नहीं. लालू लैंड फार जाब घोटाले में तो केजरीवाल शराब घोटाले में जज की निष्पक्षता पर संदेह जता चुके हैं. यह सिलसिला केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद से ही चल रहा है. 2019 के बाद इसमें तेजी आई है. हालांकि इसका कोई राजनीतिक लाभ अभी तक विपक्ष को मिलता नजर नहीं आ रहा.
EC से राहुल गांधी की अनबन
राहुल गांधी ने चुनाव आयोग (ECI) पर बार-बार गंभीर आरोप लगाए हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव और बाद में राज्यों के चुनाव में उन्होंने वोट चोरी का दावा किया, खासकर कर्नाटक के महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र में मतदाता सूची हेराफेरी का मुद्दा उन्होंने उठाया. उन्होंने चुनाव आयोग से डेटा जारी करने की मांग की और दावा किया कि आयोग निष्पक्ष नहीं है. तनातनी इतनी बढ़ी कि आयोग ने उनके आरोप को बकवास करार दिया और राहुल से शपथ-पत्र देकर शिकायत करने या राष्ट्र से माफी मांगने को कहा. राहुल ने आयोग को कंप्रोमाइज्ड बताया, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में मतदाचन के आखिरी घंटों में वोटर टर्नआउट बढ़ने पर राहुल ने सववाल उठाए.
आयोग को कठघरे में खड़ा करने के लिए उन्होंने Vote Chori वेबसाइट लांच की. जनता के माध्यम से चुनाव आयोग पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई. बिहार चुनाव के दौरान वोट चोरी को लेकर वे 15 दनों तक बिहार में अलख जगाते रहे. चुनाव आयोग और भाजपा ने इन आरोपों को यह कह कर खारिज किया कि कानूनी रास्ते उपलब्ध होने के बावजूद राजनीतिक हमले किए जा रहे हैं. यह कोई भी समझ सकता है कि बार-बार किसी संवैधानिक संस्था पर बिना ठोस सबूत के हमला लोकतंत्र की नींव को कमजोर करने वाला कदम है. यह ईसीआई की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठाता है.
कांग्रेस राहुल गांधी को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करेगी: रेवंत रेड्डी
केजरीवाल को जज पर आपत्ति
अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा पर पूर्वाग्रह का आरोप लगा कर आबकारी मामले में सुनवाई से उन्हें हटाने की मांग की. एक्साइज पॉलिसी मामले में उन्होंने जज के परिवार के केंद्रीय सरकार से लिंक, आरएसएस से जुड़े इवेंट्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स का हवाला दिया. केजरीवाल ने कोर्ट में खुद बहस की और पूर्वाग्रह खी आशंका (Apprehension of bias) का तर्क दिया. कोर्ट ने उऩकी याचिका खारिज कऱ दी. कोर्ट ऩे कहा कि पूर्वाग्रह का डर ठोस सबूतों पर आधारित होना चाहिए, न कि धारणा (perception) पर. केजरीवाल के कदम को क्या न्यापालिका पर अनुचित दबाव का आधार नहीं बन सकता? बार-बार जज पर सवाल उठाना ट्रायल में देरी की रणनीति हो सकती है.
लालू यादव को भी जज पर शक
आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव लैंड फॉर जॉब्स और अन्य मामलों में जजों पर संदेह जताते रहे हैं. हाल ही में दिल्ली कोर्ट से उन्होंने जांच एजेंसियों द्वारा जमा किए गए दस्तावेज की मांग की. कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी. इसे ट्रायल में देरी करने की उनकी चाल बताया. लालू और उनके परिवार के लोग पहले से ही सीबीआई को भाजपा का तोता बताते रहे हैं. हालांकि यह मूल टिप्पणी कांग्रेस के शासन काल में सुप्रीम कोर्ट ने की थी, जिसे लालू और उनके घर वाले रटते रहते हैं. चारा घोटाले सहित कई मामलों में उन्होंने जांच एजेंसियों और अदालतों पर राजनीतिक साजिश का आरोप लगाया. वैसे भी जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध हो चुके हैं, वे संवैधानिक संस्थाओं पर हमले करें, यह कहीं से जायज नहीं ठहराया जा सकता. संघीय व्यवस्था पर व्यक्तिगत बचाव के लिए हमले का यह तरीका ठीक नहीं है. इससे न्यायिक व्यवस्था की गरिमा को ठेस पहुंचती है.
ममता जांच एजेंसियों के विरुद्ध
ममता बनर्जी को तो मोदी सरकार बनने के बाद से ही सीबीआई, ईडी और दूसरी तमाम केंद्रीय एजेंसियों पर शक रहा है. वे लगातार इन पर हमले करती रही हैं. 2026 में I-PAC रेड के दौरान वे खुद मौके पर पहुंचीं, जिसे ईडी ने काम में व्ययवधान बताया. सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे असामान्य करार दिया. अदालत ने इसे केंद्र-राज्य विवाद नहीं माना. ममता सेंट्रल एजेंसियों पर टीएमसी को टार्गेट करने का आरोप लगाती रही हैं. वे तो उनके किलाफ करप्शन केस शुरू करने की धमकी दे चुकी हैं. अभी एमपी बने राजीव कुमार के डीजीपी रहते उन्हें बचाने के लिए ममता ने उनके घर पर डेरा तक जमा दिया था.
जानिए कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट कानून क्या है, कब होती है कोर्ट की अवमानना, क्या हो सकती है सजा. (फाइल फोटो)
ईडी और सीबीआई पर हमले अक्सर उनके शासन काल में ही हुए हैं. ममता के कई मंत्रियों को सीबीआई-ईडी ने गिर्फ्तार किया. भ्रष्टाचार के कई बड़े मामलों का खुलासा हुआ. ममता ने तो राज्य सरकार की बिना अनुमति पाए केंद्रीय एजेंसियों के बंगाल में प्रवेश पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई थीं. उनके साथ इंडिया ब्लाक की करीब दर्जन भर पार्टियां भी पहुंची थीं. खैर रहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके मंसूबे पर पानी फेर दिया. निवर्तमान राज्यपाल जगदीप धनखड़ से ममता का टकराव जगजाहिर है.
सेंट्रल स्कीम ममता को नापसंद
नरेंद्र मोदी और भाजपा से खुन्नस में ममता बनर्जी ने कई केंद्रीय योजनाओं को बंगाल में शुरू करने से साफ मना कर दिया. ऐसा तब हुआ, जब दूसरे राज्य केंद्रीय योजनाएं पाने के लिए परेशान रहते हैं. ममता ने प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ बंगाल में नहीं लागू किया. इसकी जगह उन्होंने ‘बांग्लार बाड़ी’ नाम से अपनी स्कीम शुरू की. दुनिया में चर्चित स्वास्थ्य क्षेत्र की सबसे बड़ी स्कीम ‘आयुष्मान भारत’ से भी ममता ने बंगाल को वंचित रखा. इसकी जगह उन्होंने राज्य सरकार की ‘स्वास्थ्य साथी’ योजना लागू की. किसानों को मिलने वाली पीएम किसान सम्मान योजना का लाभ भी नहीं लेने दिया. हालांकि इस दौरान वे केंद्र से फंड की मांग करती रहीं, लेकिन मिल रही केंद्रीय योजनाओं का लाभ बंगाल के लोगों को नहीं लेने दिया. भाजपा ने इसे विकास विरोधी बता कर चुनावी लाभ इस बार ले भी लिया है. ममता को घुसपैठ रोकने के लिए बीएसएफ की तैनाती और बार्डर की फेंसिंग पर भी आपत्ति रही है. वे बांग्लादेश के सरहदी इलाके के लोगों को बीएसएफ जानोव पर हमले के लिए उकसा भी चुकी हैं.
क्या वाकई संविधान को खतरा
यह सभी जानते हैं कि भारतीय लोकतंत्र में संविधान सर्वोच्च है. यह संस्थाओं की स्वतंत्रता, निष्पक्ष चुनाव, न्यायपालिका की गरिमा और संघीय ढांचे की रक्षा करता है. विपक्षी नेता अक्सर केंद्र सरकार पर संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन करने का आरोप लगाते हैं, लेकिन उनके अपने आचरण ही ऐसे होते हैं कि उन पर सवाल उठने लगते हैं.
राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी और लालू प्रसाद यादव जैसे नेता संवैधानिक संस्थाओं पर हमला बोलते दिखते हैं, जबकि खुद संवैधानिक प्रावधानों की सीमाओं को चुनौती देते प्रतीत होते हैं. उन्हें इस बात की तनिक भी फिक्र नहीं कि वे उन अदालतों पर सवाल उठाते हैं, जिनके फैसलों पर सवाल उठाने की भारतीय संविधान में मनाही है. चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा करना, राज्यपालों की भूमिका की खुली आलोचना या उन्हें नीचा दिखाने जैसे फैसले, सीबीाई और ईडी की कार्यशैली पर सवाल खड़े करने को क्या संविधान सम्मत आचरण माना जा सकता है?
अरविंद केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट के जज पर भरोसा नहीं.
खुद ही तोड़ रहे सारे प्रावधान!
अरविंद केजरीवाल जेल से दिल्ली का शासन महीनों तक चलाते रहे. जेल में बंद अपने मंत्री को तनख्वाह भी महीनों तक देते रहे. उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज पर भरोसा नहीं. अदालती बहस का वीडियो भी बनाया और सोशल मीडिया पर शेयर किया गया. केजरीवाल समेत ऐसे लोगों पर अदालत की अवमानना का केस चलेगा. लालू यादव को तो अदालत पर शक करने का खामियाजा ही भोगना पड़ गया.
राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर क्रर्नाटक की मतदाता सूची में गड़बड़ी करने के कागज दिखा कर आरोप लगाए. ममता बनर्जी को नरेंद्र मोदी से इतनी नफरत है कि उन्हें बीएसएफ की सख्ती अखरती है. बार्डर की सुरक्षा जरूरी नहीं लगती. केंद्र की योजनाएं उन्हें पसंद नहीं. पीएम से नफरत, राज्यपालों से टकराव, केंद्र के कदमों की मुखालफत और जांच एजेंसियों पर शक ममता बनर्जी को अब भी है. विपक्षी नेताओं के ये आचरण क्या संविधानसम्मत हैं. यह सवाल इसलिए कि इन्हें भाजपा से संविधान पर खतरा नजर आता है और संविधान रक्षा के लिए ये तरह-तरह के जतन भी कर रहे हैं.