शिक्षक से किसान बने शहंशाह आलम, शाही लीची से हो रही हर सीजन मोटी कमाई

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शिक्षक से किसान बने शहंशाह आलम, शाही लीची से हो रही हर सीजन मोटी कमाई


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Litchi Farming: शहंशाह आलम, सहारनपुर के नानौता क्षेत्र के किसान, लीची की कोलकाता और शाही वैरायटी की खेती कर रहे हैं. MSC और MA करने के बाद वे टीचर हैं और किसानों को भी जागरूक कर रहे हैं.

सहारनपुर के नानौता क्षेत्र के किसान शहंशाह आलम विभिन्न प्रकार की फलों की खेती के लिए जाने जाते है. शहंशाह आलम ने मैथमेटिक्स से MSC और सोशियोलॉजी से MA किया है और वर्तमान में टीचर के पद पर कार्यरत है. बच्चों को शिक्षित करने के साथ-साथ वे किसानों को भी अलग-अलग प्रकार की खेती के बारे में जागरूक कर रहे है.

शहंशाह आलम ने अपने खेतों में विभिन्न प्रकार के फलों की खेती की है, जिनमें से एक है लीची. खास बात यह है कि यह लीची कोलकाता और शाही वैरायटी की है और स्वाद में लाजवाब है.

शहंशाह आलम ने यह बागवानी 10 साल पहले अपने एक दोस्त के आइडिया से शुरू की थी, जिसका उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि यह उन्हें मालामाल कर देगी. इसके बाद से उन्होंने अन्य फलों की खेती भी शुरू की.

शहंशाह आलम ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि उनके पास लीची की तीन वैरायटी है, जिनमें कोलकाता और शाही लीची शामिल है. इस लीची को लगाए हुए उन्हें 10 साल हो चुके है.

इस लीची की खासियत यह है कि इसमें बीज न के बराबर होता है और मिठास इतनी होती है कि मिठाइयों को भी मात दे दे. शहंशाह आलम ने बताया कि वे आम का बाग लगाना चाहते थे, लेकिन उनके दोस्त राजपाल ने उन्हें लीची का बाग लगाने की सलाह दी.

कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी प्रोफेसर डॉक्टर आई.के कुशवाहा ने भी उन्हें लीची लगाने के लिए प्रेरित किया. पिछले 4 साल से लीची के पेड़ों पर अच्छा उत्पादन हो रहा है.

एक पौधे से प्रतिवर्ष 40 से 50 किलो लीची मिलती है, जो हरियाणा, पंजाब, हिमाचल, चंडीगढ़ और देहरादून जैसे राज्यों में खूब बिक रही है. इस वैरायटी की लीची में बहुत कम बीमारियां आती हैं, जो एक स्प्रे से खत्म हो जाती है.

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