सावन के अंतिम सोमवार को नर्मदेश्वर महादेव का 51 हजार रुद्राक्ष से श्रृंगार
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स्वामी कालेंद्रानंद जी महाराज ने लोकल 18 से कहा कि सावन महीने में नर्मदेश्वर महादेव का अनोखे तरीके से श्रृंगार किया जाता है. इस सावन में चौथे सोमवार को बाबा नर्मदेश्वर का 51 हजार रुद्राक्ष से श्रृंगार किया गया….और पढ़ें
जिसके बाद नर्मदा से लाकर सहारनपुर के राधा विहार में सवा 5 फीट की शिवलिंग स्थापित की गई. स्वामी कालेंद्रानंद जी महाराज का कहना है कि स्वयं साक्षात शंभू मंदिर में विराजते हैं. और उनकी विभिन्न आकृति शिवलिंग पर विराजमान है. सावन के 4 सोमवार को भगवान नर्मदेश्वर का अनोखा श्रृंगार किया जाता है. सावन के चौथे सोमवार को आज भगवान नर्वदेश्वर का 51000 रुद्राक्ष किया गया है.
स्वामी कालेंद्रानंद जी महाराज ने लोकल 18 से कहा कि सावन महीने में नर्मदेश्वर महादेव का अनोखे तरीके से श्रृंगार किया जाता है. इस सावन में चौथे सोमवार को बाबा नर्मदेश्वर का 51 हजार रुद्राक्ष से श्रृंगार किया गया. रुद्रा जब भगवान भोलेनाथ ने तांडव किया तो उनके नेत्र से जो आंसू बहे रुद्राक्ष कहलाए. भगवान शिव को रुद्राक्ष अर्पण करने से भगवान का अंश जो है क्योंकि जितने भी जगत में आत्माएं हैं. वह सभी भगवान का ही अंश है. इस सृष्टि का मूल तत्व शिव तत्व है.शिव तत्व का ही अंश आत्मा है.इसलिए भगवान शिव के नेत्रों से बहे हुए आंसू ही रुद्राक्ष बने और वह रुद्राक्ष अगर भगवान शिव को अर्पण किए जाते हैं तो आत्म तत्व में जितने भी विकार पैदा होते हैं.
नर्मदेश्वर महाराज स्वयं यहां पर विराजमान
उनमें शांति और दिव्यता का आभास होता है. रुद्राक्ष अर्पण करने से भगवान की अन्नय कृपया प्राप्त होती है. नर्मदेश्वर महाराज स्वयं यहां पर विराजमान है. कई भक्तों को तो नर्मदेश्वर महादेव ने साक्षात दर्शन दिए हैं. इस मंदिर की मान्यता की बात की जाए तो सहारनपुर ही नहीं हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान से भी श्रद्धालु आकर बाबा नर्वदेश्वर महादेव से मनोकामनाएं मांगते हैं. पूर्ण होने पर यहां पर विशाल भंडारे का आयोजन भी करते हैं.
श्रावण मास में शिव और मां पार्वती दोनों पृथ्वी का करते हैं भ्रमण
स्वामी कालेंद्रानंद जी महाराज बताते हैं कि श्रावण मास में शिव और पार्वती पृथ्वी पर भ्रमण करने और भक्तों का कल्याण करने के लिए पधारते हैं. सभी भक्त अपने-अपने भाव से भगवान भोलेनाथ की सेवा करते हैं. पूरे श्रावण मास में सभी मंदिरों में कथा, कीर्तन और यज्ञ आदि किए जाते हैं. वहीं चतुर्दशी को भगवान शिव और माता पार्वती को विदाई दी जाती है.