सिकंदरा में दफन हैं अकबर? इतिहासकार बताते हैं इससे जुड़ा बड़ा रहस्य
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उत्तर प्रदेश के आगरा में स्थित सिकंदरा का अकबर का मकबरा मुगलकालीन वास्तुकला की बेहतरीन मिसाल माना जाता है. इस स्मारक की सबसे खास बात यह है कि इसका निर्माण स्वयं सम्राट अकबर ने अपने जीवनकाल में शुरू कराया था, जिसे बाद में जहांगीर ने पूरा कराया. अनूठी बनावट, पूर्व दिशा में खुलने वाला मुख्य द्वार, शानदार नक्काशी और इससे जुड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम इस मकबरे को देश की सबसे खास धरोहरों में शामिल करते हैं. जानिए सम्राट अकबर के मकबरे से जुड़े 8 रोचक तथ्य.
उत्तर प्रदेश के आगरा को कभी मुगलों की राजधानी कहा जाता था. कई वर्षों तक मुगल शासकों ने यहीं से शासन किया, जिसके दौरान शहर में सैकड़ों मुगलकालीन इमारतों का निर्माण कराया गया. ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी जैसी ऐतिहासिक धरोहरों ने आगरा को विश्वभर में अलग पहचान दिलाई है. इन्हीं ऐतिहासिक धरोहरों में सिकंदरा स्थित मुगल बादशाह सम्राट अकबर का मकबरा भी शामिल है. इसकी सबसे खास बात यह है कि इसका निर्माण स्वयं अकबर ने साल 1600 में शुरू कराया था. यानी उन्होंने अपने जीवनकाल में ही अपने मकबरे के निर्माण की योजना बना ली थी. आज हम आपको सम्राट अकबर के इस मकबरे से जुड़े 8 रोचक रहस्यों के बारे में बता रहे हैं.

मुगल बादशाह सम्राट अकबर का निधन साल 1605 में हुआ था. उस समय उनके मकबरे का निर्माण कार्य जारी था. अकबर की मृत्यु के बाद उनके पुत्र जहांगीर ने इस निर्माण को पूरा कराया. इतिहासकारों के अनुसार, वर्ष 1613 में मकबरा पूरी तरह बनकर तैयार हुआ और यहीं सम्राट अकबर को दफनाया गया. कहा जाता है कि जहांगीर ने अपनी पसंद के अनुसार इसकी नक्काशी और डिजाइन को अंतिम रूप दिया, जिसके कारण यह मकबरा आज भी अपनी भव्यता और शानदार वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है.

मुगल बादशाह सम्राट अकबर का मकबरा आगरा के सिकंदरा में स्थित है. लाल और सफेद पत्थरों से निर्मित यह भव्य इमारत अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है. इतिहासकारों के अनुसार, अन्य इस्लामी मकबरों की तरह इसका मुख्य द्वार मक्का (पश्चिम) की ओर नहीं, बल्कि पूर्व यानी उगते सूरज की दिशा में बनाया गया है. यही विशेषता इसे अन्य मुगलकालीन मकबरों से अलग और बेहद खास बनाती है.
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मुगल बादशाह सम्राट अकबर का मकबरा आगरा के सिकंदरा में स्थित है. लाल और सफेद पत्थरों से निर्मित यह भव्य इमारत अपनी शानदार वास्तुकला के लिए जानी जाती है. इतिहासकारों के अनुसार, अन्य इस्लामी मकबरों के विपरीत इसका मुख्य द्वार मक्का (पश्चिम) की ओर नहीं, बल्कि पूर्व यानी उगते सूरज की दिशा में बनाया गया है. यही इसकी सबसे अनोखी और चर्चित विशेषताओं में से एक मानी जाती है.

इतिहासकारों के अनुसार, वर्तमान में दिखाई देने वाली कब्र में सम्राट अकबर के वास्तविक अवशेष मौजूद नहीं हैं. बताया जाता है कि एक समय जाट शासकों ने आगरा पर हमला किया था. मुगलों से बदला लेने की भावना से किए गए इस हमले में मकबरे को काफी नुकसान पहुंचा. इतिहासकारों का दावा है कि इसी दौरान अकबर की कब्र को खोदकर उनके अवशेषों को जला दिया गया था. बाद में वहां एक प्रतीकात्मक कब्र स्थापित की गई, जो आज भी मकबरे के भीतर दिखाई देती है.

आगरा के सिकंदरा स्थित मुगल बादशाह सम्राट अकबर के मकबरे पर फारसी और उर्दू में कई आयतें उकेरी गई हैं. इतिहासकारों के अनुसार, इस इमारत पर ‘अल्लाह’ के 99 नाम भी अंकित हैं. इसके अलावा संगमरमर पर बेहद खूबसूरत नक्काशी की गई है, जो मुगलकालीन शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है. इतिहासकार बताते हैं कि मकबरे के शीर्ष पर ‘अल्लाह’ के 99 नाम और ‘अकबर’ अंकित हैं. सदियों बाद भी यह कलाकारी अपनी खूबसूरती बरकरार रखे हुए है और इसे देखकर आज भी पर्यटक उस दौर की अद्भुत वास्तुकला और शिल्पकला पर हैरान रह जाते हैं.

आगरा के सिकंदरा स्थित सम्राट अकबर के मकबरे को इतिहास में हुए एक बड़े हमले का भी सामना करना पड़ा था. इतिहासकारों के अनुसार, वर्ष 1688 में जाट शासक राजा राम जाट के नेतृत्व में इस मकबरे पर हमला किया गया, जिसमें यहां भारी लूटपाट और तोड़फोड़ की गई. इस दौरान मकबरे को काफी नुकसान पहुंचा. हालांकि, बाद में इसकी मरम्मत कर इसे दोबारा संरक्षित किया गया, जिससे इसकी ऐतिहासिक भव्यता को काफी हद तक बहाल किया जा सका.

आगरा के सिकंदरा चौराहे पर स्थित मुगल बादशाह सम्राट अकबर का मकबरा आज भी बड़ी संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है. इतिहासकार प्रोफेसर अनुराग पालीवाल के अनुसार, यह ऐतिहासिक स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है. उनका कहना है कि यह मुगलकालीन इमारत अपनी वास्तुकला और भव्यता के लिए बेहद खास मानी जाती है. यदि वर्ष 1688 में इस पर हमला न हुआ होता, तो परिसर की कई अन्य इमारतें भी आज अपने मूल स्वरूप में और अधिक आकर्षक दिखाई देतीं. हालांकि, ब्रिटिश काल में इस स्मारक में कई मरम्मत और संरक्षण संबंधी कार्य भी कराए गए थे.