अमेरिका से खाड़ी देशों तक इसका डंका…पीलीभीत की बासुंरी में ऐसा क्या, जानिए असम वाला लिंक

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अमेरिका से खाड़ी देशों तक इसका डंका…पीलीभीत की बासुंरी में ऐसा क्या, जानिए असम वाला लिंक


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Pilibhit News : पीलीभीत को बांसुरी नगरी नाम से भी जाना जाता है. पीलीभीत शहर में बांसुरी कारोबार का इतिहास करीब 150 साल पुराना है. लोकल 18 से बांसुरी कारोबारी जावेद शेख कहते हैं कि शुरुआत में यह काम बहुत छोटे स्तर पर होता था, लेकिन धीरे-धीरे यहां के कारीगरों के हाथों का जादू इतना मशहूर हुआ कि पीलीभीत बांसुरी उत्पादन का केंद्र बन गया. अमेरिका, यूरोप और खाड़ी देशों के संगीत प्रेमी भी पीलीभीत की बांसुरी के कायल हैं. असम से बांस लाकर यहां के कारीगर उनमें सुर फूंकते हैं.

पीलीभीत. यूपी के पीलीभीत का नाम आते ही जहन में घने जंगल और बाघों की तस्वीर उभरती है, लेकिन इस जिले की एक और बड़ी पहचान है जो सीधे भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी है. यहां की हवाओं में रची-बसी बांसुरी की धुन आज देश की सरहदों को पार कर पूरी दुनिया में गूंज रही है. पीलीभीत को बांसुरी नगरी नाम से भी जाना जाता है. पीलीभीत शहर में बांसुरी कारोबार का इतिहास करीब 150 साल पुराना है. लोकल 18 से बातचीत में बांसुरी कारोबारी जावेद शेख कहते हैं कि इस हुनर की शुरुआत यहां के कुछ स्थानीय मुस्लिम परिवारों ने की थी, जिन्होंने अपनी मेहनत और लगन से इसे एक बड़े कारोबार का रूप दे दिया.

जावेद कहते हैं कि शुरुआत में यह काम बहुत छोटे स्तर पर होता था, लेकिन धीरे-धीरे यहां के कारीगरों के हाथों का जादू इतना मशहूर हुआ कि पीलीभीत बांसुरी उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र बन गया. आज यहां की तंग गलियों में पीढ़ियों से बसे कारीगर बड़ी बारीकी के साथ बांस को तराशते हैं और उसमें ऐसे सुरीले छेद करते हैं कि बेजान लकड़ी भी बोल उठती है. अगर हम आज की स्थिति की बात करें, तो पीलीभीत का बांसुरी कारोबार एक नए मुकाम पर है.

उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे एक जनपद-एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना में शामिल किया है, जिससे इस कारोबार को नई जान मिली है. अब यहां की बनी बांसुरियां न सिर्फ भारत के कोनों-कोनों में जाती हैं, बल्कि अमेरिका, यूरोप और खाड़ी देशों के संगीत प्रेमी भी पीलीभीत की बांसुरी के कायल हैं. बड़े-बड़े उस्ताद अपनी खास बांसुरियां यहीं के कारीगरों से ऑर्डर देकर बनवाते हैं. हालांकि मशीनरी और प्लास्टिक की बांसुरियों ने थोड़ी चुनौती जरूर दी है, लेकिन हाथ से बनी लकड़ी की बांसुरी की जो मांग है, वह आज भी कम नहीं हुई है.

खोखला और सीधा

पड़ोसी जिला बरेली, जिसे पूरी दुनिया बांस बरेली के नाम से जानती है, वहां से बांस न लेकर पीलीभीत के कारीगर हजारों किलोमीटर दूर असम से बांस क्यों मंगाते हैं? दरअसल, यह पूरा मामला क्वालिटी और संगीत के सुरों का है. बरेली का बांस फर्नीचर या भारी सामान बनाने के लिए तो अच्छा है, लेकिन बांसुरी के लिए जिन प्रजाति के बांस की जरूरत होती है, वह केवल असम के जंगलों में ही मिलता है. बांसुरी बनाने के लिए ऐसा बांस चाहिए जो अंदर से एकदम खोखला हो, सीधा हो और जिसकी दो गांठों के बीच की दूरी ज्यादा हो.

असम का बांस न केवल लचीला होता है बल्कि उसकी दीवारें भी पतली होती हैं, जिससे निकलने वाली ध्वनि बहुत मीठी और साफ होती है. यही वजह है कि लाखों की तादाद में बांस के लट्ठे असम से पीलीभीत आते हैं, जहां यहां के कारीगर अपनी सांसों से उनमें सुर फूंकते हैं. आज यह कारोबार पीलीभीत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना हुआ है.

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Priyanshu Gupta

प्रियांशु गुप्‍ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें



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