आजादी से पहले ही सुल्तानपुर में हो चुके थे विधानसभा चुनाव, जानिए कौन थे पहले विधायक?
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Sultanpur News: आज जब भी चुनाव आते हैं, तो नेताओं के बीच की सियासी जंग देखने लायक होती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आजादी मिलने से पहले भी हमारे देश में बकायदा वोट डाले जाते थे और विधायक चुने जाते थे? सुल्तानपुर जिले का राजनीतिक इतिहास बेहद दिलचस्प है, जहां साल 1937 में पहली बार विधानसभा के चुनाव हुए थे. उस दौर में बड़े-बड़े राजे-रजवाड़ों और जमींदारों को मात देकर आम लोग भी विधानसभा पहुंचे थे. आइए जानते हैं सुल्तानपुर के इतिहास का वो अनोखा किस्सा, जब देश के आजाद होने से पहले ही यहां के लोगों ने अपने विधायक चुन लिए थे.
सुल्तानपुर: क्या आपको पता है कि सुल्तानपुर में देश की आजादी से पहले ही विधायक चुन लिए गए थे? अगर नहीं, तो आज हम आपको साल 1937 के उस प्रांतीय असेंबली चुनाव की कहानी बताने जा रहे हैं, जो सुल्तानपुर के इतिहास में एक बड़ा मील का पत्थर मानी जाती है. उस दौर में सुल्तानपुर की सीटों पर उम्मीदवारों के बीच ऐसा त्रिकोणीय मुकाबला हुआ था, जिसकी चर्चा आज भी होती है. आइए जानते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में सुल्तानपुर के लोग किस तरह अपने नेता चुनते थे और कौन-कौन से दिग्गज उस समय विधानसभा पहुंचे थे.
सुल्तानपुर जिले के वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह बताते हैं कि आजादी मिलने से पहले भी उत्तर प्रदेश में आम चुनाव होते थे. उस समय प्रांतीय विधानसभा के लिए बकायदा वोटिंग होती थी और नेताओं के बीच बड़ा ही दिलचस्प मुकाबला देखने को मिलता था. सुल्तानपुर में भी ऐसा ही माहौल था, जहां बड़े-बड़े राजे-रजवाड़े और आम लोग चुनावी मैदान में आमने-सामने होते थे. जिले में पहली बार साल 1937 में विधानसभा के चुनाव कराए गए थे, जिसमें सुल्तानपुर से कुल चार लोग विधायक चुने गए थे.
इन चार सीटों पर हुआ था पहला मुकाबला
दरअसल, ब्रिटिश सरकार ने साल 1935 में एक कानून पास किया था, जिसके तहत राज्यों में विधानसभा चुनाव कराने का फैसला हुआ. शुरुआत में कांग्रेस ने इसका विरोध किया, लेकिन बाद में साल 1937 में वे चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गए. उस समय सुल्तानपुर जिले में विधानसभा की चार सीटें बनाई गई थीं. सदर विधानसभा सीट से हिंदू महासभा के उम्मीदवार सुंदरलाल गुप्ता ने कांग्रेस के बड़े नेता बाबू गणपत सहाय को हराकर सबको चौंका दिया था.
वहीं कादीपुर सीट पर कांग्रेस समाजवादी दल के रामनरेश सिंह ने दियरा रियासत के कुंवर कौशलेंद्र प्रताप शाही जैसे बड़े नाम को शिकस्त दी थी. इसके अलावा अमेठी सीट से युवराज जंग बहादुर सिंह और सुल्तानपुर की हसनपुर मुस्लिम आरक्षित सीट से अहमद अली खां चुनाव जीतकर विधायक बने थे.
आजादी से ठीक पहले का वो आखिरी चुनाव
साल 1947 में देश आजाद हुआ, लेकिन उससे ठीक पहले साल 1946 में दूसरी और आखिरी बार अंग्रेजों के राज में चुनाव कराए गए. इस चुनाव में भी दिग्गजों के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली थी. इस बार पासा पलटा और सदर सीट से कांग्रेस के बाबू गणपत सहाय चुनाव जीतने में कामयाब रहे. वहीं अमेठी सीट से उस जमाने के बड़े नेता शीतला प्रसाद सिंह ने जीत दर्ज की. कादीपुर सीट पर रामनरेश सिंह ने अपना दबदबा कायम रखा और वे दोबारा विधायक चुने गए. इसके साथ ही हसनपुर की मुस्लिम आरक्षित सीट पर इस बार राजा अहमद अली खां की जगह नाजिम अली ने जीत हासिल की थी.
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सीमा नाथ 6 साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शाह टाइम्स में रिपोर्टिंग के साथ की जिसके बाद कुछ समय उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम …और पढ़ें