FCRA बिल पर अखिलेश इतना मुखर क्यों? क्या यूपी चुनाव 2027 से है खास कनेक्शन?
नई दिल्ली. संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिनों में फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) संशोधन विधेयक को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच घमासान मचा हुआ है. बुधवार लोकसभा में FCRA विधेयक को पेश करने के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. अखिलेश यादव ने साफ-साफ शब्दों में कहा है कि विदेशी अंशदान नियमन से जुड़े नए कड़े प्रावधानों के जरिए गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के धार्मिक, सामाजिक ट्रस्टों और विशेष रूप से अल्पसंख्यक शिक्षण व कल्याणकारी संस्थाओं को निशाना बनाने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने सदन में ऐलान किया कि वे किसी भी कीमत पर अल्पसंख्यकों और वंचित वर्गों के अधिकारों पर आंच नहीं आने देंगे. अखिलेश यादव के इस बयान के बाद केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने विपक्ष को चैलेंज देते हुए कहा कि यह बात कोई साबित कर दें. बता दें विपक्ष के भारी विरोध के बाद इस विधेयक को जेपीसी के पास भेज दिया गया है. ऐसे में जानते हैं कि यूपी चुनाव 2027 से पहले इस बिल को मोदी सरकार क्यों पास कराने पर अड़ा हुआ है.
बुधवार को सदन की कार्यवाही के दौरान एफसीआरए बिल को सदन के पटल पर रखा गया. इस बिल को पटल पर रखते ही अखिलेश यादव ने सत्ता पक्ष पर बड़ा आरोप लगा दिया. अखिलेश ने कहा, ‘बिल के प्रावधान पारदर्शी फंडिंग की आड़ में स्वायत्त संस्थाओं और सामाजिक संगठनों को प्रशासनिक रूप से प्रताड़ित करने वाले हैं. देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सरोकार में लगे अल्पसंख्यक व सामाजिक ट्रस्टों की विदेशी सहायता को पूरी तरह नियंत्रित करने का यह प्रयास असंवैधानिक है.’
FCRA बिल को लेकर नाराज हो गए अखिलेश यादव.
एफसीआरए पर भिड़ गए अखिलेश-रिजिजू
अखिलेश यादव के आक्रामक तेवरों पर पलटवार करते हुए संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी करारा जवाब दिया. केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने इस विधेयक को सदन में रखा, जिसे लोकसभा अध्यक्ष ने जेपीसी के पास भेज दिया. किरेन रिजिजू ने अखिलेश यादव को चुनौती देते हुए कहा कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी धन के दुरुपयोग को रोकने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. रिजिजू ने कहा कि यदि विपक्ष को बिल के तकनीकी प्रावधानों पर कोई आपत्ति है, तो वे भागने के बजाय चर्चा का हिस्सा बनें. भारी हंगामे और विपक्ष की मांग के बाद सरकार ने बिल को आगे के सूक्ष्म अध्ययन के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजने का प्रस्ताव रखा.
FCRA बिल के विरोध का UP चुनाव 2027 से क्या है सीधा कनेक्शन?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव का संसद में FCRA बिल को लेकर इतना मुखर होना महज संयोग नहीं है, बल्कि इसके पीछे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की गहरी रणनीतिक बिसात बिछी हुई है.
PDA और मुस्लिम वोट बैंक का ध्रुवीकरण : 2024 के लोकसभा चुनाव में सफलता हासिल करने के बाद अखिलेश यादव अपने PDA पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक फॉर्मूले को 2027 के लिए और मजबूत करना चाहते हैं. FCRA बिल के जरिए अल्पसंख्यक मदरसों, ट्रस्टों और एनजीओ के प्रभावित होने की आशंका को उठाकर वे मुस्लिम मतदाताओं के बीच सपा की स्वीकार्यता को सर्वोपरि बनाए रखना चाहते हैं.
संसद से प्रदेश तक नैरेटिव गढ़ना : बीएसपी सुप्रीमो मायावती और असदुद्दीन ओवैसी की चुनौतियों को दरकिनार करते हुए अखिलेश यादव खुद को केंद्र व राज्य की बीजेपी सरकारों के खिलाफ अल्पसंख्यकों की सबसे बुलंद आवाज के रूप में पेश कर रहे हैं.
मुस्लिम संस्थाओं में हलचलम : उत्तर प्रदेश में कई बड़े मदरसे और सामाजिक संस्थाएं विदेशी फंडिंग नियमावली के कड़े होने से सशंकित हैं. अखिलेश यादव का यह रुख उन्हें सीधे इन सामाजिक व धार्मिक नेटवर्क के करीब लाता है.
JPC में जाने के बाद क्या होगा आगे का रास्ता?
सरकार द्वारा FCRA बिल को Joint Parliamentary Committee को सौंपे जाने के फैसले के बाद अब विपक्षी और सत्ता पक्ष के सांसद मिलकर इसके एक-एक क्लॉज पर विचार करेंगे. कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के प्रतिनिधि समिति में अपनी आपत्तियां दर्ज कराएंगे. हालांकि, संसद भवन के मकर द्वार पर विरोध प्रदर्शनों के बीच अखिलेश यादव ने साफ किया कि वे जेपीसी के भीतर भी अपनी मांगों पर डटे रहेंगे.