कभी थी शान, आज खंडहर में तब्दील… सुल्तानपुर की ऐतिहासिक इमारत बहा रही बदहाली के आंसू
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Sultanpur Heritage Site: गोमती नदी के किनारे बसा पुराना सुल्तानपुर आज भी अपने इतिहास की कई अनसुनी कहानियों को समेटे हुए है. यहां मौजूद लखौरी ईंटों से बनी प्राचीन संरचना को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं. कोई इसे पुराने इमामबाड़े से जोड़ता है तो कोई भर राजा के किले का अवशेष बताता है. कभी विशाल इमारत के रूप में पहचान रखने वाली यह ऐतिहासिक धरोहर अब देखरेख के अभाव में धीरे-धीरे खंडहर में बदल रही है. स्थानीय लोगों को डर है कि समय रहते संरक्षण नहीं मिला तो सुल्तानपुर की यह निशानी इतिहास के पन्नों तक सिमट जाएगी.
गोमती नदी के किनारे बसा पुराना सुल्तानपुर अपने अंदर इतिहास के कई अनकहे किस्से समेटे हुए है. इसी इतिहास की एक निशानी आज भी यहां मौजूद है, जिसे स्थानीय लोग प्राचीन इमामबाड़ा मानते हैं, जबकि कई लोग इसे भर राजा के पुराने किले का हिस्सा बताते हैं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सर्वेक्षण में भी इस स्थल को किले के अवशेष के तौर पर देखा गया है. लखौरी ईंटों से बनी यह प्राचीन संरचना कभी विशाल इमारत के रूप में जानी जाती थी, लेकिन अब धीरे-धीरे खंडहर में बदल रही है.
सल्तानपुर के वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह लोकल 18 से बताते हैं कि पुराना सुल्तानपुर गोमती नदी के उत्तर दिशा में बसा हुआ था. यहीं पर इस विशाल इमारत का निर्माण कराया गया था. ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों की तोपों से यह इमारत क्षतिग्रस्त हो गई थी. इसके बाद समय के साथ इसका ज्यादातर हिस्सा नष्ट होता चला गया.
आज भी इस इमारत का बचा हुआ ढांचा अपने इतिहास की गवाही देता है. यह संरचना लखौरी ईंटों से बनाई गई है, जो उस दौर की निर्माण शैली को दिखाती है. हालांकि सालों से देखरेख नहीं होने के कारण इसकी हालत लगातार खराब होती जा रही है. कई जगहों से ईंटें टूट चुकी हैं और इमारत का हिस्सा कमजोर होता जा रहा है. अगर समय रहते इसका संरक्षण नहीं किया गया तो यह ऐतिहासिक धरोहर पूरी तरह खत्म हो सकती है.
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ऐतिहासिक नजरिए से सुल्तानपुर जिले का अपना खास महत्व रहा है. किसी भी जगह के पुराने इतिहास को समझने में वहां मौजूद प्राचीन इमारतें, अवशेष, अभिलेख, सिक्के और अन्य पुरानी चीजें अहम भूमिका निभाती हैं. लेकिन संरक्षण के अभाव में ऐसी कई धरोहरें धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खो रही हैं. सुल्तानपुर की यह इमारत भी अब इसी उपेक्षा का शिकार हो रही है.
इस ऐतिहासिक स्थल की पहचान को लेकर अलग-अलग मत हैं. मुस्लिम समुदाय के लोग इसे प्राचीन इमामबाड़ा मानते हैं, जबकि भर समाज के लोग इसे भर राजा के किले का हिस्सा बताते हैं. वहीं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सर्वेक्षण में भी इसे किले के हिस्से के तौर पर देखा गया है. यही वजह है कि यह स्थान इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाता है.
कई वर्षों से संरक्षण नहीं मिलने के कारण यह धरोहर अब धीरे-धीरे खंडहर में बदल रही है. इसकी पुरानी लखौरी ईंटें टूट रही हैं और पूरी संरचना कमजोर होती जा रही है. स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर जल्द ही इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में इस ऐतिहासिक निशानी को बचाना मुश्किल हो जाएगा. स्थानीय लोगों के अनुसार इस ऐतिहासिक स्थल के आसपास अब आवासीय मकान बन रहे हैं. बढ़ते अतिक्रमण के कारण इसका पुराना स्वरूप भी प्रभावित हो रहा है. लोगों का कहना है कि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो आने वाले वर्षों में इस इमारत के बचे हुए अवशेष भी खत्म हो सकते हैं.
स्थानीय निवासी मोहम्मद इकबाल लोकल 18 से बताते हैं कि इस ऐतिहासिक स्थल तक पहुंचने के लिए कोई बेहतर रास्ता नहीं है. यहां साफ-सफाई की व्यवस्था भी नहीं है. इसी वजह से लोग इस जगह तक कम पहुंच पाते हैं और प्रशासन का ध्यान भी इस ओर नहीं जा पा रहा है.
स्थानीय लोगों की मांग है कि प्रशासन इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित घोषित करे और इसके संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए. इसके अलावा यहां तक पहुंचने के लिए रास्ता बनाया जाए, नियमित साफ-सफाई कराई जाए और इसे पर्यटन एवं विरासत स्थल के रूप में विकसित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी सुल्तानपुर के इस गौरवशाली इतिहास को जान सकें.