क्या ऑक्सीटोसिन से रातोंरात बढ़ जाता है लौकी, खीरा, गोभी का साइज़? मिथक या सच? जानें पूरी बात
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Effect Of Oxytocin On Vegetables : फल और सब्ज़ियों को रातों-रात बड़ा करने के लिए ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन के इस्तेमाल का डर दशकों से बना हुआ है. हालांकि, वैज्ञानिक तथ्य बताते हैं कि सब्ज़ियों में ऑक्सीटोसिन का उपयोग केवल एक भ्रम है. यह हार्मोन पौधों पर प्रभावी ही नहीं होता और इसका इंजेक्शन लगाना तार्किक रूप से संभव नहीं है.
जिला उद्यान अधिकारी डॉ पुनीत कुमार पाठक ने बताया कि ऑक्सीटोसिन मूल रूप से एक मानव (और स्तनधारी) हार्मोन है. इसका मुख्य काम बच्चे के जन्म के दौरान संकुचन पैदा करना और दूध के स्राव में मदद करना है. यह मनुष्यों और पशुओं के तंत्रिका तंत्र में बनता है. इसका सीधा संबंध जानवरों की प्रजनन और व्यवहार से है, न कि पौधों के विकास से है.

सब्ज़ियों और फलों को बड़ा करने के लिए पादप हार्मोन जैसे जिब्बेरेलिन या एथिलीन का उपयोग किया जाता है. ऑक्सीटोसिन एक पशु हार्मोन है. पौधों में इसके लिए कोई ग्राही नहीं होते, इसलिए, यदि किसी सब्जी में ऑक्सीटोसिन इंजेक्ट किया भी जाए, तो वह पौधों की वृद्धि या आकार पर कोई जैविक प्रभाव नहीं डालेगा.

बाज़ार में सब्जियों की मात्रा को देखते हुए, हर फल या सब्जी में अलग से इंजेक्शन लगाना व्यावहारिक रूप से असंभव है. इतने बड़े पैमाने पर इंजेक्शन लगाने में समय, श्रम और लागत इतनी अधिक होगी कि यह किसानों के लिए लाभदायक नहीं रहेगा. इसलिए, यह धारणा तार्किक आधार पर भी गलत है.

ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन का भ्रम अक्सर उन सब्जियों के कारण फैला है, जिन्हें तेजी से बढ़ने वाले पादप हार्मोन से उपचारित किया जाता है. जब खीरा या लौकी जैसे फल अचानक बड़े दिखते हैं, तो लोग अनजाने में इसे पशु हार्मोन ऑक्सीटोसिन से जोड़ देते हैं. यह केवल समझ की कमी से उपजा एक मिथक है.

किसानों के बीच असली चिंता का विषय पादप वृद्धि नियामक (PGR) या एथिलीन राइपनर का अवैध या अत्यधिक उपयोग है. ये रसायन फलों और सब्जियों को समय से पहले पका सकते हैं या उनका आकार बढ़ा सकते हैं, जिससे उनकी पोषण गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है. हमें इस पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है.

उपभोक्ताओं को इस भ्रम से डरने की बजाय, सुरक्षित और स्वस्थ आहार के लिए जागरूक रहना चाहिए. हमेशा विश्वसनीय किसानों और दुकानदारों से ही मौसमी और ताज़ा सब्जियां खरीदें. अच्छी तरह से धोकर और पकाकर खाने से अधिकांश रासायनिक अवशेषों के जोखिम को कम किया जा सकता है.