क्यों खास हैं मेरठ के ये मंदिर? पांडवों से लेकर कर्ण तक की कथा समेटे, जानिए
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क्रांति धरा मेरठ सिर्फ आज़ादी के इतिहास में ही नहीं, बल्कि पौराणिक दृष्टि से भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है. यहां स्थित अनेक प्राचीन मंदिर हजारों साल पुराने माने जाते हैं, जिनका सीधा संबंध महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्य युगों से जुड़ा हुआ है. ये पवित्र स्थल न केवल आस्था का केंद्र हैं, बल्कि मेरठ की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को भी समृद्ध करते हैं.
मेरठ नौचंदी परिसर स्थित मां चंडी देवी मंदिर हजारों वर्ष पुराना बताया जाता है. मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित संजय कुमार शर्मा के अनुसार रावण की पत्नी मंदोदरी ने ही इस मंदिर की स्थापना कराई थी. तब से लेकर आज तक यह स्थान आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. विश्वविख्यात ऐतिहासिक नौचंदी मेला भी मां चंडी देवी के नाम पर ही आयोजित किया जाता है, और नौचंदी ट्रेन का नाम भी देवी मां से ही जुड़ा हुआ है.

मेरठ कैंट स्थित बिलेश्वर नाथ मंदिर को लेकर भी हजारों वर्ष पुरानी यही किंवदंती प्रचलित है. माना जाता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी यहां विधि-विधान से भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करती थीं, जिसके फलस्वरूप उन्हें रावण जैसा विद्वान पति प्राप्त हुआ. इसी मान्यता के कारण हर सोमवार, खासकर शिवरात्रि और महाशिवरात्रि पर देशभर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. यह मंदिर मराठा शैली में निर्मित है, जिसमें प्रवेश करने के लिए गुफानुमा मार्ग से झुककर ही भीतर जाना पड़ता है.

मेरठ कैंट स्थित बाबा औघड़नाथ मंदिर के प्रति भी भक्तों में गहरी आस्था देखने को मिलती है. यहां स्थापित भगवान भोलेनाथ की शिवलिंग को स्वयंभू माना जाता है. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत भी इसी मंदिर से होने की मान्यता है. यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राज्यपाल आनंदीबेन पटेल सहित अनेक प्रमुख नेता यहां दर्शन कर चुके हैं. हर साल शिवरात्रि और महाशिवरात्रि पर लाखों श्रद्धालु इस पवित्र धाम में पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं.

इसी तरह मेरठ के हस्तिनापुर की बात करें तो इसके साथ महाभारत काल के अनेक ऐतिहासिक तथ्य जुड़े हुए हैं. यहां स्थित पांडेश्वर मंदिर विशेष रूप से प्रसिद्ध है. मान्यता है कि महाभारत काल में पांचों पांडव बूढ़ी गंगा में स्नान करने के बाद यहीं विधि-विधान से भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना किया करते थे. इस मंदिर में भगवान शिव के साथ-साथ पांचों पांडव की मूर्तियां भी स्थापित हैं, जो इस स्थान की प्राचीनता और पौराणिक महत्व को और अधिक प्रमाणित करती हैं.

हस्तिनापुर में स्थित कर्ण मंदिर भी अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक महत्व रखता है. मान्यता है कि महाभारत काल में महाराज कर्ण इसी स्थान पर अपनी कुलदेवी की पूजा-अर्चना किया करते थे. कहा जाता है कि कुलदेवी उनसे प्रसन्न होकर उन्हें सवा मन सोना उपहारस्वरूप प्रदान करती थीं, जिसे वह ब्राह्मणों को दान में दे देते थे. इसी कारण यहां आज भी श्रद्धालुओं की विशेष आस्था बनी हुई है. मान्यता है कि जो भी भक्त यहां आकर श्रद्धा से पूजा करता है, उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. ये सभी मंदिर न केवल आस्था के प्रमुख केंद्र हैं, बल्कि पर्यटन की दृष्टि से भी इनका विशेष महत्व माना जाता है.