गाजीपुर का वो धुरंधर, जो पाकिस्तानी सेना के लिए बना काल, तबाह किए अमेरिकी टैंक
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Ghazipur News: 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में गाजीपुर के धामूपुर गांव के वीर अब्दुल हमीद ने अदम्य साहस और रणनीति का परिचय देते हुए दुश्मन के अमेरिकी निर्मित पैटन टैंकों का डटकर मुकाबला किया. उनकी वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. आइए इस वीर जवान के शौर्य की कहानी आपको बताते हैं.
गाजीपुर: भारत में ऐसे कई जांबाज सिपाही पैदा हुए, जिन्होंने पाकिस्तानी सेना से लेकर उनके कई हथियारों को ध्वस्त कर दिया. उन्हीं में से गाजीपुर की धरती भी शामिल है, जिसने देश को ऐसे कई वीर सपूत दिए हैं, लेकिन जब भी अदम्य साहस और रणकौशल की बात होती है, तो परमवीर चक्र विजेता कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार वीर अब्दुल हमीद का नाम सबसे पहले लिया जाता है. 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने अपनी आरसीएल गन लगी जीप से दुश्मन के आधुनिक पैटन टैंकों को निशाना बनाकर ऐसा पराक्रम दिखाया, जिसने उन्हें भारतीय सैन्य इतिहास के महानायकों में अमर कर दिया.
लोकल 18 की टीम ने पीजी कॉलेज, गाजीपुर के पूर्व विभागाध्यक्ष (सैन्य विज्ञान), डॉ. बद्रीनाथ सिंह से खास बातचीत की, जिन्होंने वीर अब्दुल हमीद के शौर्य के अनछुए पहलुओं और जिले में उनकी विरासत पर विस्तार से चर्चा की.
अमेरिकी पैटन टैंकों के परखच्चे उड़ाए
डॉ. बद्रीनाथ सिंह बताते हैं कि 1965 के युद्ध के दौरान जब पाकिस्तान अमेरिका निर्मित आधुनिक और दुर्जेय माने जाने वाले ‘पैटन टैंकों’ के सहारे भारतीय सीमा में घुसने की कोशिश कर रहा था, तब वीर अब्दुल हमीद ने युवावस्था में ही वह कारनामा कर दिखाया, जिस पर आज पूरे देश को नाज है.
अकेले कुल 7 पाकिस्तानी टैंकों को किया तबाह
उन्होंने बताया कि युद्ध क्षेत्र में एक समय ऐसी विपरीत परिस्थितियां उत्पन्न हो गई थीं कि वीर अब्दुल हमीद अपनी गन-माउंटेड जीप के साथ लगभग अकेले ही पाकिस्तानी टैंकों की रेजीमेंट के सामने खड़े थे. उनके पास आधुनिक टैंक नहीं, बल्कि केवल एक साधारण जीप और अचूक निशाना था. डॉ. सिंह के अनुसार, इसी हौसले और सूझबूझ के दम पर उन्होंने पाकिस्तान के अभिमान (अमेरिकी टैंकों) को मिट्टी में मिला दिया. वीर अब्दुल हमीद ने अपनी छोटी सी जीप पर सवार होकर अकेले ही कुल 7 पाकिस्तानी टैंकों को पूरी तरह तबाह कर दिया.
वीरता सम्मान से हुए सम्मानित
डॉ. बद्रीनाथ सिंह बताते हैं कि वीर अब्दुल हमीद के पास भारी-भरकम टैंक नहीं था. वे एक जीप पर लगी 106 मिमी रिकॉइललेस गन से दुश्मन का मुकाबला कर रहे थे. उन्होंने युद्ध क्षेत्र की परिस्थितियों को अपने पक्ष में इस्तेमाल किया और गन्ने के खेतों व ऊंची झाड़ियों की आड़ लेकर दुश्मन के टैंकों पर सटीक निशाने लगाए. 10 सितंबर 1965 को युद्ध के दौरान वीर अब्दुल हमीद वीरगति को प्राप्त हुए. देश की रक्षा में उनके असाधारण साहस और बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश का सर्वोच्च सैन्य सम्मान ‘परमवीर चक्र’ प्रदान किया.
गाजीपुर में आज भी जीवित है उनकी विरासत
डॉ. बद्रीनाथ सिंह बताते हैं कि गाजीपुर आज भी अपने इस वीर सपूत पर गर्व करता है. उनके पैतृक गांव धामूपुर में स्मारक स्थापित है. जिले में उनके नाम पर वीर अब्दुल हमीद पुल बनाया गया है, जबकि कई शिक्षण संस्थानों, सड़कों और सार्वजनिक स्थलों का नाम भी उनके सम्मान में रखा गया है. उनका जीवन आज भी युवाओं के लिए साहस, कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति का प्रेरणा स्रोत है.
क्या कहते हैं डॉ. बद्रीनाथ सिंह?
डॉ. बद्रीनाथ सिंह कहते हैं, वीर अब्दुल हमीद ने यह साबित कर दिया कि युद्ध सिर्फ आधुनिक हथियारों से नहीं, बल्कि साहस, रणनीति और अटूट आत्मविश्वास से जीता जाता है. उनकी शौर्यगाथा आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बनी रहेगी.
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आर्यन सेठ, News18 Hindi में डिजिटल डेस्क पर जुड़े हैं और जनवरी 2026 से उत्तर प्रदेश की राजनीति, अपराध, प्रशासन, वायरल और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर खबरें लिखते हैं. जामिया मिलिया इस्लामिया दिल्ल…
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