पाठा के जंगलों का हरा खजाना बदल रहा आदिवासी परिवारों की किस्मत, रोजाना हो रही कमाई

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पाठा के जंगलों का हरा खजाना बदल रहा आदिवासी परिवारों की किस्मत, रोजाना हो रही कमाई


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Tendu Patta Benefits: यूपी के चित्रकूट का पाठा इलाका वैसे तो बेहद पिछड़ा माना जाता है, लेकिन गर्मी का मौसम यहां के आदिवासी परिवारों के लिए रोजगार की नई उम्मीद लेकर आता है. इस सीजन में जंगलों में होने वाला तेंदू पत्ता इन परिवारों की आजीविका का सबसे बड़ा सहारा बनता है. सुबह 4 बजे के अंधेरे में ही महिलाएं और पुरुष घने जंगलों की तरफ निकल जाते हैं और दिनभर मेहनत कर पत्ते चुनते हैं, जिससे उन्हें रोज 300 से 400 रुपये की कमाई हो जाती है.

चित्रकूट: उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले का पाठा क्षेत्र लंबे समय से सूबे के सबसे पिछड़े इलाकों में गिना जाता रहा है. यहां आज भी रोजगार के पर्याप्त साधन न होने के कारण स्थानीय आदिवासी परिवारों के सामने रोजी-रोटी का बड़ा संकट रहता है. काम न मिलने की वजह से कई परिवारों को दूसरे राज्यों या जिलों में पलायन भी करना पड़ता है. लेकिन कड़कती धूप और गर्मी का यह मौसम इन गरीब परिवारों के लिए रोजगार का एक बेहद महत्वपूर्ण जरिया लेकर आता है. इस मौसम में पाठा के जंगलों में मिलने वाला तेंदू पत्ता इन आदिवासियों के घर का चूल्हा जलाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है.

सुबह 4 बजे ही जंगल की ओर निकल पड़ते हैं पैर
जैसे ही गर्मियों की शुरुआत होती है, पाठा के घने जंगलों में तेंदू के पत्तों की भरमार हो जाती है. इन पत्तों को तोड़ने के काम में पूरा का पूरा परिवार जुट जाता है. इलाके की महिलाएं, पुरुष और यहां तक कि युवा भी सुबह तड़के करीब 4 बजे ही अंधेरे में जंगलों की ओर निकल जाते हैं. जंगली जानवरों और कांटों की परवाह किए बिना ये लोग कई घंटों तक जंगलों में भटकते हैं और पत्ते इकट्ठा करते हैं. सुबह करीब 9 बजे तक ये लोग वापस अपने घरों को लौट आते हैं.

स्थानीय महिला निर्मला ने बताया कि जंगल से पत्ते लाने के बाद असली मेहनत शुरू होती है. घर आकर इन पत्तों को अच्छे से छांटा जाता है और फिर 50-50 पत्तों की छोटी-छोटी गड्डियां बनाई जाती हैं. इसके बाद इन गड्डियों को धूप में अच्छी तरह सुखाया जाता है ताकि पत्तों की क्वालिटी खराब न हो. पूरी तरह तैयार होने के बाद इन गड्डियों को वन विभाग के सरकारी खरीद केंद्रों पर ले जाकर बेच दिया जाता है.

रोजाना हो जाती है नकद आमदनी
तेंदू पत्ता बीनने वाली एक अन्य महिला रेखा ने बताया कि यह सीजन उनके लिए किसी त्योहार से कम नहीं होता. रोज सुबह जंगल जाकर पत्ते इकट्ठा करने और उन्हें बेचने से आसानी से 300 से 400 रुपये तक की रोज की कमाई हो जाती है. इस नकद आमदनी से परिवार के रोज के राशन-पानी का खर्च निकल जाता है और शादी-ब्याह या बीमारी के समय होने वाली आर्थिक परेशानियां काफी हद तक कम हो जाती हैं.

इसी पत्ते से बनती है बाजारों में बिकने वाली बीड़ी
रेखा आगे बताती हैं कि यह वही तेंदू पत्ता है, जिसका इस्तेमाल बाजारों में बिकने वाली बीड़ी को बनाने में किया जाता है. बीड़ी फैक्ट्रियों में इसकी भारी मांग होने के कारण सरकारी केंद्रों पर यह बड़े पैमाने पर खरीदा जाता है. पाठा के आदिवासियों के लिए यह तेंदू पत्ता किसी ‘हरे सोने’ से कम नहीं है, क्योंकि इसी की बदौलत वे साल के इन दो-तीन महीनों में अच्छी कमाई कर पाते हैं और अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं.

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Seema Nath

सीमा नाथ 6 साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शाह टाइम्स में रिपोर्टिंग के साथ की जिसके बाद कुछ समय उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम …और पढ़ें



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