यह कोई मामूली पुल नहीं…जौनपुर की है शान, कैदियों ने किया था इसका निर्माण, 184 साल पुराना है इतिहास

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यह कोई मामूली पुल नहीं…जौनपुर की है शान, कैदियों ने किया था इसका निर्माण, 184 साल पुराना है इतिहास


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Jaunpur News: जौनपुर की ऐतिहासिक पुलिया, जिसे अंग्रेजों ने 1841 में कैदियों से बनवाया था, आज भी मजबूत है. पत्थरों और चूना-गारा से बनी यह पुलिया संरक्षित करने की मांग है.

जौनपुर:  जिले की ऐतिहासिक धरोहरों में से एक है दीवानी कचहरी के बगल में स्थित एतिहासिक पुल, जिसका निर्माण अंग्रेजों के शासनकाल में सितंबर 1841 में कराया गया था. यह पुल आम पुल नहीं, बल्कि इतिहास का जीवित दस्तावेज है. इसका निर्माण किसी सामान्य मजदूरों से नहीं, बल्कि उस दौर की जेल में बंद कैदियों से कराया गया था. अंग्रेज अधिकारियों के आदेश पर जब कैदी दिन-रात मेहनत करके इस पुल को बना रहे थे, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह संरचना आने वाले कई दशकों तक मजबूत बनी रहेगी.

पुल  का निर्माण कार्य उस समय की कठिन परिस्थितियों में हुआ था. न तो आधुनिक मशीनें थीं और न ही तकनीकी साधन. केवल हाथों की मेहनत, कुछ औजार और कैदियों की मजबूरी ने मिलकर एक ऐसी संरचना तैयार की, जो आज भी समय की कसौटी पर खरी उतरती है. करीब 184 साल बाद भी यह पुल  उपयोग में है और इसके पत्थर आज भी मजबूती से अपनी जगह पर टिके हैं. इस पुल  की विशेषता इसकी बनावट और सामग्री है. इसे पूरी तरह पत्थरों से बनाया गया है, जिसमें चूना और गारा का उपयोग किया गया था. इसकी मेहराब नुमा संरचना न केवल आकर्षक दिखती है, बल्कि इंजीनियरिंग का भी बेहतरीन उदाहरण है. यह पुलिया न केवल पैदल राहगीरों के लिए सहूलियत का माध्यम बन रही, बल्कि आज भी आसपास के क्षेत्र के लोग इसे गौरव से देखते हैं.

इतिहासकारों का मानना है कि अंग्रेजों द्वारा बनाई गई ऐसी कई संरचनाएं आज भी भारत में मौजूद हैं, लेकिन इस पुलिया की खास बात यह है कि इसे जेल के कैदियों द्वारा बनाया गया था, जो उस दौर में एक अलग ही सामाजिक और राजनीतिक संदेश देता है. यह पुलिया उस समय के सामाजिक हालात, श्रमिक व्यवस्था और इंजीनियरिंग ज्ञान का प्रत्यक्ष उदाहरण है.

स्थानीय नागरिकों और इतिहास प्रेमियों का मानना है कि इस पुल को संरक्षित किया जाना चाहिए. यह जौनपुर की शान है और आने वाली पीढ़ियों को यह बताने का जरिया कि अंग्रेजी हुकूमत में भी कैदियों से किस तरह के निर्माण कार्य कराए जाते थे. आज जहां नए पुल कुछ ही वर्षों में जर्जर हो जाते हैं, वहीं यह पुल  18वीं सदी से खड़ा है, जो अपने आप में एक रोमांचक और प्रेरणादायक कहानी कहती है. जिला प्रशासन और पुरातत्व विभाग से लोग मांग कर रहे हैं कि इस पुल को विरासत स्थल घोषित किया जाए और इसका जीर्णोद्धार कर इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए. ताकि लोग सिर्फ इसे पार न करें, बल्कि इसकी ऐतिहासिकता को भी समझें.

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