वायसराय को दिखाए काले झंडे, साइमन कमीशन को खदेड़ा… बहराइच के वीरों की कहानी
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Bahraich News: आजादी के 15 अगस्त के पावन पर्व के उपलक्ष्य में जब-जब भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास दोहराया जाएगा, उत्तर प्रदेश के बहराइच और श्रावस्ती जनपद का नाम स्वर्णिम अक्षरों में याद किया जाएगा. आइए यहां के वीरों की कहानी विस्तार से जानते हैं.
बहराइच: भारत देश को आजादी दिलाने में जनपद बहराइच का भी बड़ा योगदान रहा है. यहां के भी शूरवीरों ने सीधे अंग्रेजों से लोहा लिया था, तब जाकर सबके सहयोग से आजादी मिली थी. बहराइच के सेनानियों ने साइमन कमीशन को काले झंडे दिखाए थे. अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच विरोधी बना था. आईए विस्तार से जानते हैं बहराइच के वीरों की कहानी, बहराइच के स्वतंत्रता सेनानियों के संगठन अध्यक्ष अगवाकार यदुनाथ प्रसाद यादव की जुबानी.
बहराइच के सेनानियों की अमर बलिदान गाथा
आजादी के 15 अगस्त के पावन पर्व के उपलक्ष्य में जब-जब भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास दोहराया जाएगा, उत्तर प्रदेश के बहराइच और श्रावस्ती जनपद का नाम स्वर्णिम अक्षरों में याद किया जाएगा. क्रांति और प्रतिरोध की गाथा में जहां बलिया को बागी कहा गया, वहीं अंग्रेजी हुकूमत की ईट से ईट बजाने और कभी घुटने न टेकने के कारण बहराइच को विरोधी की ऐतिहासिक उपाधि मिली.
वायसराय को दिखाए काले झंडे, साइमन कमीशन को खदेड़ा
बहराइच की मिट्टी का इतिहास स्वाभिमान और प्रतिरोध से भरा रहा है. जब ब्रिटिश वायसराय ने बहराइच का दौरा किया, तो यहां के निडर सेनानियों ने अपनी जान की परवाह किए बिना उसे काले झंडे दिखाकर ब्रिटिश हुकूमत को खुली चुनौती दी. इसके साथ ही, जब साइमन कमीशन भारत आया, तो बहराइच की धरती से गो बैक साइमन के नारे गूंज उठे. यहां के वीरों ने काले झंडे दिखाकर कमीशन को वापस जाने पर मजबूर कर दिया. इस ऐतिहासिक कदम के बाद अंग्रेज सरकार ने स्थानीय आंदोलनकारियों को भयंकर प्रताड़नाएं और यातनाएं दीं, लेकिन यहां के सेनानी पीछे नहीं हटे. यहां तक कि कई लोगों ने सीधे लोहा भी लिया और जेल भी गए.
1857 की क्रांति राजा बलभद्र सिंह
बहराइच में शूरवीरों की बात हो और राजा बलभद्र सिंह का नाम ना आए, ऐसा हो नहीं सकता. जहां 1857 के गदर में बलिया के मंगल पांडे ने क्रांति का आगाज किया और दिल्ली में बहादुर शाह जफर अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ रहे थे, ठीक उसी समय बहराइच चेलहरी के नरेश महाराजा बलभद्र सिंह ने अपनी सेना के साथ अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाला. महाराजा बलभद्र सिंह और उनके साथ बहराइच के लगभग आधा दर्जन तत्कालीन वीरों ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी. किताबों में आज भी ऐसा दर्द है कि सिर कटने के बाद भी राजा बलभद्र सिंह अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे.
सिर कटने के बाद भी संघर्ष का जज्बा
कहा जाता है कि बहराइच के वीरों में देशप्रेम का ऐसा जज्बा था कि सिर कट जाने के बाद भी वे अंग्रेजों से लोहा लेते रहे. शहादत और स्वाभिमान की यह परंपरा हमारी सनातन संस्कृति से जुड़ी है. यह पराक्रम हमें सम्राट पृथ्वीराज चौहान और महाकवि चंद्रबरदाई के उस अमर प्रसंग की याद दिलाता है, जहां बंदी बनाए जाने के बाद भी सम्राट ने चंद्रबरदाई की प्रसिद्ध पंक्तियों (चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान) के आधार पर शब्दभेदी बाण चलाकर सुल्तान का अंत किया था और शत्रुओं के हाथों अपमानित होने के बजाय दोनों वीरों ने एक-दूसरे का वध कर अपनी आन-बान-शान की रक्षा की थी. बहराइच का स्वतंत्रता संग्राम भी इसी अमर देशभक्ति और स्वाभिमान का प्रतीक है.
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आर्यन सेठ, News18 Hindi में डिजिटल डेस्क पर जुड़े हैं और जनवरी 2026 से उत्तर प्रदेश की राजनीति, अपराध, प्रशासन, वायरल और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर खबरें लिखते हैं. जामिया मिलिया इस्लामिया दिल्ल…
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