63 फीट ऊंची यह प्रतिमा क्यों बन गई देश की सबसे बड़ी पहचान? जानिए कहानी
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पंडित दीन दयाल उपाध्याय की 63 फीट ऊंची प्रतिमा भारतीय राजनीति और विचारधारा के एक महान नेता को समर्पित एक भव्य स्मारक है. पंच लोहा से निर्मित यह प्रतिमा वाराणसी के पड़ाव स्थित स्मारक केंद्र में स्थापित है, जिसका अनावरण 19 फरवरी 2020 को किया गया था. यह स्मारक न केवल उनके जीवन और योगदान को दर्शाता है, बल्कि उनके एकात्म मानववाद और राष्ट्र निर्माण के विचारों को भी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का कार्य करता है.
राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले एक विशिष्ट नेता के रूप में पंडित दीन दयाल उपाध्याय की 63 फीट ऊंची प्रतिमा का निर्माण किया गया है, जिसका अनावरण 19 फरवरी 2020 को पंडित दीन दयाल उपाध्याय केंद्र पड़ाव में किया गया. यह प्रतिमा पंच लोहा (5 तत्वों) से बनी है और देश में इनकी सबसे ऊंची प्रतिमा है. स्मारक केंद्र में स्वर्गीय दीन दयाल उपाध्याय के जीवन और समय से संबंधित उत्कीर्ण चित्र भी हैं.

पंडित दीन दयाल उपाध्याय के विचारों और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को सम्मान देने के उद्देश्य से स्थापित की गई उनकी 63 फीट ऊंची प्रतिमा आज लोगों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन चुकी है. पंच लोहा से निर्मित यह भव्य प्रतिमा देश में पंडित दीन दयाल उपाध्याय की सबसे ऊंची प्रतिमा मानी जाती है. इसका अनावरण 19 फरवरी 2020 को पंडित दीन दयाल उपाध्याय केंद्र पड़ाव में किया गया था. यह स्मारक न केवल उनकी स्मृतियों को जीवंत करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को उनके विचारों और आदर्शों से भी परिचित कराता है.

इस विशाल प्रतिमा का निर्माण विशेष रूप से इस उद्देश्य से किया गया कि देश के युवाओं और नागरिकों को पंडित दीन दयाल उपाध्याय के जीवन दर्शन और उनके राष्ट्रवादी विचारों से प्रेरणा मिल सके. प्रतिमा की ऊंचाई 63 फीट रखी गई है, जो इसे अत्यंत भव्य और दूर से दिखाई देने वाला स्मारक बनाती है. पंच लोहा, यानी पांच धातुओं के मिश्रण से तैयार की गई यह प्रतिमा मजबूती, कला और भारतीय परंपरा का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है.
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प्रतिमा के अनावरण के अवसर पर बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे थे. समारोह में विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और पंडित दीन दयाल उपाध्याय के योगदान को याद किया. वक्ताओं ने कहा कि उन्होंने एकात्म मानववाद का सिद्धांत देकर भारतीय राजनीति और समाज को नई दिशा प्रदान की. उनका मानना था कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचना चाहिए और यही सोच आज भी देश की नीतियों में दिखाई देती है.

स्मारक केंद्र को केवल एक प्रतिमा स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रेरणा केंद्र के रूप में विकसित किया गया है. यहां आने वाले लोगों को पंडित दीन दयाल उपाध्याय के जीवन से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां देखने को मिलती हैं. स्मारक परिसर में उनके जीवन और समय से संबंधित उत्कीर्ण चित्र लगाए गए हैं, जो उनके संघर्ष, सामाजिक कार्यों और राजनीतिक यात्रा को दर्शाते हैं. इन चित्रों के माध्यम से आगंतुक उनके व्यक्तित्व और विचारों को करीब से समझ पाते हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार यह स्मारक भारतीय सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक शिल्पकला का अनूठा संगम है. प्रतिमा को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि यह दूर से ही श्रद्धा और सम्मान का भाव उत्पन्न करती है. शाम के समय प्रकाश व्यवस्था के बीच यह प्रतिमा और भी आकर्षक दिखाई देती है, जिससे यहां आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु काफी प्रभावित होते हैं.

स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रतिमा बनने के बाद यह क्षेत्र एक प्रमुख पर्यटन और प्रेरणा स्थल के रूप में उभरकर सामने आया है. यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में छात्र, युवा और पर्यटक पहुंच रहे हैं. लोगों का मानना है कि इस प्रकार के स्मारक महापुरुषों के विचारों को जीवित रखने का कार्य करते हैं और समाज को सकारात्मक दिशा देने में सहायक होते हैं.

पंडित दीन दयाल उपाध्याय भारतीय राजनीति के ऐसे विचारक थे, जिन्होंने राष्ट्रहित को सर्वोपरि माना. उनका जीवन सादगी, सेवा और समर्पण का प्रतीक रहा. यही कारण है कि उनकी यह विशाल प्रतिमा केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि भारतीय विचारधारा और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बन गई है. यह स्मारक आने वाली पीढ़ियों को उनके आदर्शों और विचारों से निरंतर प्रेरित करता रहेगा.