Independence Day Story : बांस के पेड़ों ने कर रखा था अंग्रेजों की नाक में दम, बाराबंकी का ये गांव था नेताजी का गुप्त ठिकाना
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Independence Day 2025 : नेताजी को ऐसी जगह चाहिए थी, जो अंग्रेजों की नजर से दूर हो. बाराबंकी के राजा प्रताप बहादुर ने इसका बीड़ा उठाया और न्यौता भेज दिया. अगले 2 साल तक यहां क्रांतिकारी गतिविधियां चलती रहीं.
बाराबंकी. देश आजादी की एक और सालगिरह मनाने की तैयारी में जुटा है. ये मौक हमें अनेक भारतीयों की कुर्बानी के बाद मिला. कई जगहें भी आजादी की लड़ाई की मूक गवाह हैं. यूपी के बाराबंकी जिले का हड़हा गांव उनमें से एक है. हड़हा स्टेट की मिट्टी से उसी समय की आहट आती है, जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस यहां गुप्त आश्रय के लिए आए थे. गांव की शांत रात की रहस्यमयी चुप्पिंयों के बीच यहां हथियार तैयार होते और फिर गुप्त मार्गों से आजाद हिंद फौज तक पहुंचाए जाते थे. “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” का जुनून यहां की हवाओं में घुला हुआ था. ये धरती कभी आजादी की चिंगारी का केंद्र थी.
अंग्रेजों को लग गई भनक
राजा प्रताप बहादुर सिंह ने इस गुप्त अभियान का साहसिक नेतृत्व किया. उनके वंशज कुंवर रिंकू सिंह उस दौर की पूरी कहानी को खुद बयां करते हैं. बताया जाता है कि स्वतंत्रता संग्राम के उग्र दौर में नेताजी को ऐसे सुरक्षित स्थान की जरूरत थी जहां हथियार बनाया जा सके, सैनिक ट्रेनिंग की जा सके और योजनाएं बनाई जा सकें. राजा प्रताप बहादुर सिंह ने इस जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाया. गांव को चारों ओर घने बांस के जंगलों ने इस जगह को अंग्रेजों की नजर से बचाए रखा. गांव के लोगों की मानें तो अंधेरी रातों में यहां बम, देसी पिस्तौल और दूसरे हथियार बनाए जाते थे और फिर गुप्त मार्गों से आजाद हिंद फौज तक पहुंचाए जाते थे. यह सिलसिला करीब दो साल तक चलता रहा, जब तक अंग्रेजों को भनक न लग गई.
किसी ने मुंह नहीं खोला
एक दिन अंग्रेजों को इसकी भनक लग गई, जिसके बाद यहां छापेमारी हुई. कई लोग गिरफ्तार और प्रताड़ित हुए लेकिन किसी ने भी नेताजी की उपस्थिति का राज नहीं खोला. नेताजी की याद में 24 नवंबर 1938 को राजा प्रताप बहादुर सिंह ने गांव में उनकी प्रतिमा स्थापित करवाई. उनके वंशज कुंवर रिंकू सिंह कहते हैं कि हमारे परबाबा ने नेताजी की हर जरूरत की व्यवस्था की. उनका ठहरना, भोजन, धन, सब कुछ उपलब्ध कराया. अंग्रेजों को भ्रमित करने के लिए यह गांव काफी उपयुक्त था क्योंकि यह घने जंगलों से घिरा था. हड़हा गांव आज भी उस अतीत का साक्षी है जहां की मिट्टी ने आजादी की तपिश झेली.
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