जोमैटो ने बढ़ाई प्लेटफॉर्म फीस, गाजियाबाद के लोगों ‘मनमानी’ पर उठाए सवाल
Zomato Platform Fee Hike: महंगाई की मार झेल रही जनता की जेब पर एक और बड़ा प्रहार हुआ है. प्रमुख ऑनलाइन फूड डिलीवरी ऐप ज़ोमैटो (Zomato) ने एक बार फिर अपनी ‘प्लेटफॉर्म फीस’ में इजाफा कर दिया है. 20 मार्च 2026 से लागू हुई इन नई दरों ने न केवल खाने के शौकीनों का जायका बिगाड़ दिया है, बल्कि कामकाजी जोड़ों और मध्यम वर्गीय परिवारों के घरेलू बजट को भी हिला कर रख दिया है. गाजियाबाद के पॉश इलाकों, जैसे राजनगर एक्सटेंशन और कविनगर में इस बढ़ोतरी को लेकर भारी आक्रोश देखा जा रहा है, जहां लोग इसे निजी कंपनियों की ‘मनमानी’ करार दे रहे हैं.
अब कितना ढीला करना होगा बटुआ?
दरअसल, ऑनलाइन फूड डिलीवरी के क्षेत्र में दिग्गज कंपनी ज़ोमैटो ने अपनी प्लेटफॉर्म फीस में लगभग 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है. अब ग्राहकों को प्रति ऑर्डर ₹12.50 की जगह ₹14.90 (बिना जीएसटी के) प्लेटफॉर्म फीस देनी होगी. यह शुल्क डिलीवरी चार्ज, रेस्टोरेंट बिल और जीएसटी से अलग होता है, जो हर ऑर्डर पर अनिवार्य रूप से लागू होता है. 20 मार्च 2026 से प्रभावी हुए इस फैसले के बाद, अब बाहर से खाना मंगाना पहले के मुकाबले काफी महंगा हो गया है.
गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन में दिखा गुस्से का माहौल
गाजियाबाद का राजनगर एक्सटेंशन, जो अपनी गगनचुंबी सोसायटियों के लिए जाना जाता है, यहां के निवासियों के लिए ऑनलाइन फूड डिलीवरी एक जरूरत बन चुकी है. ज़ोमैटो के इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए यहां के निवासी नितिन शर्मा ने कहा कि पिछले छह महीनों में यह दूसरी बार है जब चार्ज बढ़ाए गए हैं. उन्होंने बताया,
सोसायटियों में रहने वाले लोगों के लिए अक्सर बाहर जाकर खाना लाना संभव नहीं होता, इसलिए हम इन ऐप्स पर निर्भर हैं. लेकिन बार-बार बढ़ती कीमतें अब इस सुविधा को एक बोझ बना रही हैं. पहले ही सिलेंडर की किल्लत और अन्य खर्चों से आम आदमी परेशान है, ऊपर से इन निजी कंपनियों की मनमानी ने मुश्किलें और बढ़ा दी हैं.
वर्किंग कपल्स के लिए बढ़ी मुसीबत, बजट हुआ बेपटरी
वहीं, आज के दौर में जब पति-पत्नी दोनों कामकाजी हैं, तो समय की कमी के कारण ऑनलाइन खाना ऑर्डर करना एक मजबूरी बन जाता है. राजनगर एक्सटेंशन के ही निवासी कपिल गोयल का कहना है कि महंगाई अब हर तरफ से घेर रही है. उन्होंने कहा,
कामकाजी होने के कारण कई बार घर पर खाना बनाना संभव नहीं होता. ऐसे में ज़ोमैटो और स्विगी जैसे ऐप ही सहारा होते हैं. लेकिन जब हर ऑर्डर पर एक्स्ट्रा फीस बढ़ती है, तो महीने के अंत में यह एक बड़ा अंतर पैदा कर देती है. पेट्रोल-डीजल और सिलेंडर के बढ़ते दाम पहले ही चिंता का विषय थे, अब खाने पर भी एक्स्ट्रा मार पड़ रही है.
स्थानी निवासी अनुराधा ने भी अपनी चिंता साझा की. उन्होंने बताया कि नौकरी और घर की जिम्मेदारियों के बीच समय का तालमेल बिठाना मुश्किल होता है. अनुराधा के अनुसार, ‘महंगाई पहले से ही कमर तोड़ रही है. बार-बार बढ़ते चार्ज अब रोजमर्रा के खर्चों का हिस्सा बन गए हैं. सरकार को इन निजी कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीतियों पर लगाम लगानी चाहिए ताकि आम जनता को कुछ राहत मिल सके.
बुजुर्गों और बच्चों की देखभाल में ऑनलाइन फूड का सहारा, अब संकट में
कविनगर इलाके की निवासी काजल छिब्बर ने कहा कि जिन घरों में बुजुर्ग और छोटे बच्चे हैं, वहां अक्सर बाहर जाकर खाना लाना मुमकिन नहीं हो पाता. काजल ने कहा, ‘हमारे लिए ऑनलाइन फूड मंगवाना कोई शौक नहीं बल्कि मजबूरी है. लेकिन अब ऑर्डर करने से पहले हमें दो बार सोचना पड़ता है. मध्यम वर्गीय परिवार के लिए 2-3 रुपए की बढ़ोतरी भी मायने रखती है, क्योंकि महीने भर के सैकड़ों छोटे खर्चे मिलकर बड़ा बजट बिगाड़ देते हैं.
जनता की मांग, हस्तक्षेप करे सरकार
गाजियाबाद के विभिन्न इलाकों के लोगों का एक ही स्वर में कहना है कि इस तरह की बढ़ोतरी पर लगाम लगनी चाहिए. लोगों का मानना है कि कंपनियां अपनी मोनोपॉली (एकाधिकार) का फायदा उठा रही हैं. स्थानीय निवासियों ने सरकार और संबंधित विभागों से मांग की है कि निजी ई-कॉमर्स और फूड डिलीवरी कंपनियों के सर्विस चार्ज और प्लेटफॉर्म फीस के लिए एक ठोस नीति बनाई जाए, ताकि आम आदमी को इस ‘अदृश्य महंगाई’ से बचाया जा सके.