खान चाचा: कभी टेबल-सिगड़ी से शुरू हुआ था स्टॉल, अब कैसे बना दिल्ली-NCR का मशहूर फूड चेन
Khan Chacha Success Story: दिल्ली के खान मार्केट में सबसे मशहूर और पुरानी फूड चेन में से एक खाना चाचा (KHAN CHACHA) के संस्थापक के बेटे को दिल्ली पुलिस ने एक चौंकाने वाले मामले गिरफ्तार किया है. 49 साल के मोहम्मद जावेद को पुलिस ने साइबर फ्रॉड और डिजिटल अरेस्ट घोटालों में म्यूल अकाउंट्स उपलब्ध कराने के आरोप में गिरफ्तार किया है. इस फ्रॉड की रकम करीब 3.3 करोड़ रुपये बताई जा रही है, जिसमें ‘सेलेम जावेद रूल द रोल्स सिन्स 1960’ नाम की कंपनी खान मार्केट में खान चाचा के फ्रैंचाइजी बिजनेस से जुड़ी बताई गई है.
आज हम आपको खान चाचा की 50 साल पुरानी विरासत को फिर से याद दिलाने जा रहे हैं जब एक टेबल और सिगड़ी पर मटन-चिकन कबाब बेचने से शुरू हुआ सफर दिल्ली के सबसे मशहूर खान मार्केट की सबसे मशहूर दुकान में से एक और एनसीआर की मशहूर फूड चेन तक पहुंच गया.
बात साल 1960 के आसपास की है जब सहारनपुर से एक बंदा काम ढूंढते-ढूंढते दिल्ली आया. 1948 में जन्मे हाजी बंदा हसन ने दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में दुकान चलाने वाले हाजी मोहम्मद यूसुफ के यहां काम करके मुगलई व्यंजन जैसे कबाब, टिक्का और अन्य पारंपरिक डिशेज बनाना सीखना शुरू कर दिया. कई साल तक काम सीखने के बाद उन्होंने एक बार प्रगति मैदान में लगे एक मेले में स्टॉल लगाया, जहां लोगों के अच्छे रिस्पॉन्स ने उन्हें अपना काम शुरू करने का ख्वाब दे दिया.
असली कहानी शुरू होती है साल 1972 से जब हाजी बंदा हसन ने जामा मस्जिद का इलाका छोड़कर खान मार्केट में नंबर 55 पर छोटा सा कियोस्क खोल लिया. वहां काम करने के लिए उनके पास सामान के नाम पर सिर्फ एक टेबल और सिगड़ी थी. जिससे वे मटन सीख कबाब और चिकन टिक्का बेचने लगे. हाजी के हाथ के स्वाद ने लोगों को उनका चहेता बना दिया और लोग प्यार से ‘खान चाचा’ कहने लगे.
खान चाचा के मुगलई फूड और कबाब के लोग आज भी दीवाने हैं.
शुरुआत में वन मैन आर्मी की तरह वह काम करते रहे और उनके स्वाद की जादूगरी ने जल्दी ही लोगों को उनका मुरीद बना दिया. यहां तक कि लोग उनके हाथ के मटन सीख कबाब खाने के लिए विशेष रूप से खान मार्केट आने लगे, उनकी छोटी सी स्टॉल के सामने आलीशान गाड़ियां आकर रुकने लगीं और यहीं से उन्होंने इसे बड़ा करने के लिए सोचना शुरू कर दिया. हालांकि पैसे की कमी के चलते यह सपना जल्दी साकार नहीं हो पाया.
फिर जब 1996 में उनके छोटे बेटे मोहम्मद सेलेम ने बिजनेस जॉइन किया तो दो साल बाद 1998 में दुकान 36B पर शिफ्ट की गई. दुकान को बढ़ता देख साल 2000 में उनके बड़े बेटे मोहम्मद जावेद भी कॉर्पोरेट जॉब छोड़कर खान चाचा की दुकान को चलाने के लिए आ गए.
सेलेम कुकिंग संभालते, जावेद ऑर्डर और कस्टमर हैंडलिंग करते. धीरे-धीरे मेन्यू बढ़ा चिकन टिक्का, पनीर टिक्का, रूमाली रोटी में लिपटे काठी रोल्स. इस तरह खान चाचा दिल्ली का पहला ब्रांड बना जिसने काठी रोल्स को पॉपुलर बनाया और खान चाचा को स्वाद पसंद लोगों का चहेता.
किस चीज के लिए मशहूर है ब्रांड?
खान चाचा का जादू उसके मेल्ट-इन-माउथ कबाबों में है. मटन सीख कबाब, चिकन टिक्का रोल, पनीर टिक्का रोल. यहां सब कुछ तंदूरी मिलता है. इस आउटलेट की सबसे खास बात यहां के ताजा मसाले और ग्रीन चटनी के साथ रूमाली रोटी हैं. यहां कोई फैंसी अम्बियंस नहीं था, बस स्वाद और किफायती कीमत थी. 1970-80 के दशक में यहां लोग पूरे शहर से आते थे.उस समय तक होम डिलीवरी का जमाना नहीं था, फिर भी लंबी कतारें लगती थीं.
सेलिब्रिटी और पावर कॉरिडोर का पसंदीदा ठिकाना
इस तरह खान चाचा सिर्फ आम आदमी का नहीं बल्कि एलीट का भी स्पॉट बन गया. पॉलिटिशियंस जैसे फारूक अब्दुल्ला और ओमर अब्दुल्ला यहां नियमित आते थे. सोशलाइट्स, हाई-हील्स वाली महिलाएं, कॉलेज स्टूडेंट्स, मार्केट के दुकानदार सब आते. बॉलीवुड और क्रिकेट स्टार्स भी गुमनामी में यहां आकर खाना खाते.
यहां की दीवारों पर विराट कोहली, रणवीर सिंह, स्वरा भास्कर, प्रिया दत्त, दलेर मेहंदी की तस्वीरें आज भी लगी हैं. सेलिब्रिटीज को अंधेरे चश्मे लगाकर आने की जरूरत नहीं पड़ती थी, यहां स्वाद सबको बराबर करता था.
ब्रांड की उड़ान और कालरा का अधिग्रहण
2009-10 में परिवार ने नवनीत कलरा के साथ पार्टनरशिप की. कालरा ने ब्रांड को मॉडर्न बनाया. नए आउटलेट्स, बेहतर अम्बियंस, टेक अपग्रेड. 2016 में ट्रेडमार्क विवाद हुआ लेकिन 2020 में परिवार ने ब्रांड आधिकारिक रूप से नवनीत कालरा को बेच दिया. कालरा ने खान चाचा को दिल्ली-एनसीआर की बड़ी चेन बना दिया.
आज खान चाचा के 21 आउटलेट्स हैं. खान मार्केट, साकेत, वसंत कुंज, सीपी, द्वारका, नेहरू प्लेस, राजौरी गार्डन, एरोसिटी आदि में. वहीं अब यह अन्य राज्यों में हरियाणा, पंजाब (मोहाली) और उत्तर प्रदेश तक पहुंच चुका है.
विदेशों में मौजूदगी?
खान चाचा मुख्य रूप से भारत केंद्रित ब्रांड है. मूल परिवार ने ‘रूल द रोल्स’ के तहत भारत में विस्तार किया (दिल्ली-एनसीआर, चंडीगढ़, गुजरात) और विदेशों में प्लानिंग की थी, लेकिन अभी तक कोई विदेशी आउटलेट नहीं खुला. कालरा के नेतृत्व में भी ब्रांड देश के अंदर ही मजबूत हुआ.
विरासत और विवाद
मूल परिवार ने ब्रांड बेचने के बाद खान मार्केट में ही, ठीक बगल में ‘सेलेम जावेद रूल द रोल्स’ नाम से नया बिजनेस शुरू किया स्वाद वही पुराना, लेकिन नाम नया. हालांकि अब पुलिस की जांच में जावेद का अकाउंट फ्रॉड में इस्तेमाल होने से विवाद पैदा हो गया है.
क्या बोले कालरा
नवनीत कलरा ने स्पष्ट किया, ‘हमारा ब्रांड अब उनके साथ जुड़ा नहीं. वे 10 साल पहले हमारे साथ काम करते थे.’
खान चाचा की कहानी सफलता, स्वाद और मेहनत की मिसाल है. हाजी बंदा हसन की एक सिगड़ी से शुरू हुई यात्रा ने दिल्ली की स्ट्रीट फूड कल्चर को बदला. लाखों लोग आज भी उसके रोल्स और कबाबों के दीवाने हैं. लेकिन मोहम्मद जावेद की गिरफ्तारी याद दिलाती है कि विरासत को बनाए रखना कितना मुश्किल है.
खान चाचा रेस्टोरेंट कहां है?
खान चाचा दिल्ली के खान मार्केट में मशहूर फूड चेन है. इसके कई आउटलेट्स दिल्ली की अलग-अलग लोकेशनों पर हैं.
खान चाचा नाम क्यों पड़ा?
इसे सहारनपुर से आए हाजी बंदा हसन नाम के व्यक्ति ने साल 1972 में शुरू किया था. उनके मटन सीख कबाब और तंदूरी टिक्का के स्वाद के दीवानों ने उन्हें प्यार से खान चाचा कहना शुरू किया, यहीं से यह नाम पड़ा.
इसे कब और किसने शुरू किया
साल 1972 में सिगड़ी और लेबल के सहारे हाजी बंदा हसन ने खान मार्केट के 55 में एक कियोस्क शुरू किया गया और बाद में यह वहां की मशहूर फूड चेन बन गया.
खान चाचा में क्या मिलता है
मटन सीख कबाब, चिकन टिक्का रोल, पनीर टिक्का रोल. यहां सब कुछ तंदूरी मिलता है. इस आउटलेट की सबसे खास बात यहां के ताजा मसाले और ग्रीन चटनी के साथ रूमाली रोटी लोगों को खूब पसंद आती है.
इसके बाकी आउटलेट कहां हैं?
खान चाचा के 21 आउटलेट्स हैं. खान मार्केट, साकेत, वसंत कुंज, सीपी, द्वारका, नेहरू प्लेस, राजौरी गार्डन, एरोसिटी आदि में हैं.
यहां कौन सेलिब्रिटी आते रहे हैं?
खान चाचा सिर्फ आम आदमी का नहीं बल्कि एलीट का भी स्पॉट बन गया. पॉलिटिशियंस जैसे फारूक अब्दुल्ला और ओमर अब्दुल्ला यहां नियमित आते थे.